कितनी बार हम कोई फैसला इसलिए
टाल देते हैं क्योंकि मन में पहला सवाल आता है, लोग क्या कहेंगे?
धीरे-धीरे दूसरों की राय हमारे फैसलों से बड़ी हो जाती है। हम अपनी पसंद, अपनी खुशी और अपनी सहजता को पीछे रखकर एक ऐसी स्वीकृति पाने की कोशिश करते हैं, जो कभी पूरी नहीं होती।
हर व्यक्ति आपको अपनी दृष्टि से देखेगा। हर किसी को खुश करना न संभव है, न जरूरी।
अपने निर्णयों की जिम्मेदारी लीजिए, अपनी अंतरात्मा की सुनिए और दूसरों की राय को अपनी शांति पर अधिकार मत दीजिए।
जब 'लोग क्या सोचेंगे?' की जगह 'मेरे लिए क्या सही है?' महत्वपूर्ण हो जाता है, तब भीतर स्वराज्य जागता है।
लोगों की राय से मुक्त होना, मन की सबसे सुंदर स्वतंत्रताओं में से एक
है।