लोग कहते हैं—
जब बारिश बंद हो जाती है,
तो छतरी लेकर चलना लोगों को बोझ लगने लगता है।
जब उजाला हो जाता है,
तो मोमबत्ती की रोशनी की ज़रूरत नहीं रहती,
और वह किसी कोने में पड़ी रह जाती है।
और जब किसी अंधे की आँखों में रोशनी लौट आती है,
तो सबसे पहले वह अपनी लाठी को छोड़ देता है।
मगर समझदार लोग कहते हैं—
छतरी को बोझ मत समझो,
क्योंकि बारिश दोबारा शुरू हो सकती है।
मोमबत्ती को कोने में मत फेंको,
उसे किसी महफ़ूज़ जगह रख दो,
क्योंकि अँधेरा दोबारा आ सकता है।
और अगर किसी अंधे की आँखों में कभी रोशनी लौट आए,
तो ज़रूरी नहीं कि वह अपनी लाठी फेंक दे।
हो सकता है उसके लिए वह सिर्फ़ एक लाठी न हो—
बल्कि उस दौर की सबसे क़ीमती निशानी हो,
जब दुनिया धुँधली थी,
रास्ते अनजान थे,
और जब कोई साथ नहीं था,
तब वही उसके साथ थी।
इसलिए हर उस चीज़ को बेकार मत समझो
जिसकी ज़रूरत तुम्हें आज नहीं है।
कुछ चीज़ें वक़्त गुज़रने के बाद भी
अपनी क़ीमत नहीं खोतीं—
क्योंकि उनकी क़ीमत उनके काम में नहीं,
बल्कि इस बात में होती है कि
वह तुम्हारे बुरे वक़्त में तुम्हारे साथ थीं।
-Shanaya khan