दिन का शोर हुआ अब रुख़्सत, ढलने लगी ये काली रात,
सन्नाटों की चादर ओढ़े, खुद से कर लें थोड़ी बात।
सड़कें सूनी, रोशन गलियाँ, बंद हुए सब दरवाज़े,
ना अब कोई भीड़ का हिस्सा, ना झूठे कुछ अंदाज़े।
तारों की इस महफ़िल में अब, चाँद अकेला जगता है,
दिन भर की इस दौड़ के आगे, रात का लम्हा सच लगता है।
जो बातें हो सकीं न सबसे, वो ख़ामोशी कहती है,
दिल के गहरे एक कोने में, एक नदी सी बहती है।
ना कोई उम्मीद किसी से, ना कोई बेजा फ़रियाद,
अंधेरे में जलती-बुझती, बस कुछ भूली-बिसरी याद।
सो जाने दो इस दुनिया को, तुम अपनी एक दुनिया बुन लो,
गहरे सन्नाटों के अंदर, बहता हुआ सुकून तुम चुन लो।