रात का सन्नाटा अब डराने लगा है,
ज़िंदगी का हर ज़ख़्म पुराना सताने लगा है।
दिन भर तो उलझे रहे दुनिया के शोर में,
अब अंधेरा दिल की हर एक आस मिटाने लगा है।
किस राह पर निकला था, कहाँ आ गया हूँ,
ज़िंदगी की इस दौड़ में खुद को गँवा आया हूँ।
कोई मंजिल नज़र आती नहीं इस मोड़ पर,
थका-हारा बस ख़ामोशी की चादर ओढ़ आया हूँ।
काँच की तरह बिखरे पड़े हैं सारे अरमान,
रूह है ख़ामोश और अंदर मचा है तूफ़ान।
हासिल कुछ न हुआ इतनी जद्दोजहद के बाद,
बस यूँ ही गुज़रती जा रही है यह बेबस जान।
काश थम जाए ये वक्त इसी गहरी छाँव में,
न कोई दर्द हो अब इस बेनाम से गाँव में।
सो जाए यह दिल हमेशा के लिए इस तरह,
जैसे कोई लहर खो जाती है समंदर के बहाव में