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अधूरी मोहब्बत का धागा
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उस गली में वो फिर इस तरह नज़र आए हमको,
जैसे उस गली को कभी उन्होंने छोड़ा ही नहीं था।
वो हँसी, वो मुस्कुराहट, वो सुकून भरा चेहरा,
लगता था बिन हमारे उन्होंने जीना नहीं छोड़ा था।
गली में ये रौनक़ें क्यों हैं, क्यों सज रहा है घर उनका,
क्या किसी और से उन्होंने कोई नया रिश्ता जोड़ा था?
और अगर जा रहे हैं वो छोड़ हमें किसी और का होने,
फिर क्यों हमारी मोहब्बत का धागा नहीं तोड़ा था?
हम ग़फ़लत में थे पा लेंगे उनको, उम्मीदें पाले हुए,
हमारी उम्मीदों को जिसने तोड़ा, वो शादी का जोड़ा था।
रुख़्सती थी उनकी, चले थे वो किसी और का घर आबाद
करने,
वो अलग बात है कि हमको अँधेरों में उन्होंने छोड़ा था।
अब आख़िर क्या होगा उस मोहब्बत के आशियाने का,
जिसे अपने हाथों से सजाकर आज ख़ुद ही तोड़ा था।
-MASHAALLHA
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