The Download Link has been successfully sent to your Mobile Number. Please Download the App.
Continue log in with
By clicking Log In, you agree to Matrubharti "Terms of Use" and "Privacy Policy"
Verification
Download App
Get a link to download app
एक अधूरा सवाल आरोही अपने कमरे की साफ़-सफ़ाई में लगी हुई थी। उसकी शादी में अब बस पंद्रह दिन ही रह गए थे। वह अपनी पसंद की हर वह चीज़ समेटकर अपने साथ ले जाना चाहती थी, जिससे उसकी कोई ख़ास याद जुड़ी थी या जिससे उसे लगाव था। अपनी यादों को समेटने में उसे जो सुकून मिलता था, वह उसकी छोटी-छोटी आँखों में साफ़ झलकता था। आरोही को इस तरह काम में लगा देखकर उसकी माँ ने प्यार से उसके सिर पर हल्की-सी चपत लगाई और बोलीं, “पंद्रह दिन ब्याह में रह गए, लेकिन तेरा बचपन अभी तक नहीं गया! अब भी तू बस बचपन की यादें समेटने में लगी है!” आरोही ने माँ की तरफ़ देखा और दोनों बाँहें उनके गले में डालकर बोली, “कैसे भूल जाऊँ? ये मेरी साथी हैं!” माँ ने उसके हाथों की पकड़ से ख़ुद को छुड़ाया और बोलीं, “तू और तेरी बातें! मेरी समझ में तो कुछ नहीं आता।” फिर मेज़ पर चाय का कप रखते हुए बोलीं, “थोड़ा आराम भी कर लेना। ज़्यादा थक मत जाना, नहीं तो शादी से पहले बीमार पड़ जाएगी।” आरोही मुस्कुरा दी। माँ को हाँ में जवाब देकर फिर अपने काम में लग गई। अक्टूबर की रातों की ठंडक दिनभर की झुलसा देने वाली धूप के बाद सुकून देती है। वह रात भी अपने साथ ठंडी हवा और सुकून लेकर आई थी। सामान समेटते हुए आरोही को अपनी एक बहुत पुरानी डायरी मिली। वह डायरी लेकर छत पर चली गई और ठंडी हवा के बीच बैठ गई। दूर से आती नवरात्रि के भजनों की आवाज़ उसे बचपन की याद दिलाने लगी। कैसे वह सबके साथ मेला देखने जाया करती थी! उन दिनों को याद करके उसके होंठों पर मुस्कान आ गई। धीरे-धीरे वह डायरी के पन्ने पलटने लगी। अपनी ही लिखी बातें पढ़कर कभी मुस्कुराती, तो कभी हँस देती। लेकिन एक पन्ने पर आकर उसकी उँगलियाँ ठहर गईं। उस पन्ने को देखते ही उसके चेहरे की मुस्कान ग़ायब हो गई। अचानक उसके भीतर एक अजीब-सा सन्नाटा उतर आया। उस पन्ने पर एक नाम लिखा था—रवि। रवि का नाम देखते ही आरोही अतीत की उन गलियों में लौट गई, जहाँ उसकी बचपन की यादें अब भी साँस ले रही थीं। आरोही जब पहली बार स्कूल गई थी, तब वह एलकेजी में थी। उस कक्षा की बहुत-सी बातें उसे अब याद नहीं थीं, लेकिन रवि याद था। वह उसी की कक्षा में पढ़ता था। स्कूल के पहले दिन से ही दोनों एक ही कक्षा में रहे। यह साथ एलकेजी से यूकेजी, फिर पहली और आगे की कक्षाओं तक यूँ ही चलता रहा। आरोही को याद आया कि जब वह पाँचवीं कक्षा में थी, तब एक पेंसिल को लेकर उसकी और रवि की लड़ाई हो गई थी। वह रोते हुए मैम के पास गई और रवि की शिकायत कर आई। मैम ने रवि को डाँट भी लगाई, लेकिन रवि भी कहाँ चुप बैठने वाला था! उसने वह पेंसिल आरोही को कभी वापस दी ही नहीं। आठवीं कक्षा में भी दोनों की कहानी कुछ अलग नहीं थी। न चाहते हुए भी उन्हें एक ही समूह में रख दिया गया था। सर से बहुत कहने के बावजूद दोनों को साथ ही काम करना पड़ा। उन दिनों स्कूल में लड़के-लड़कियों के बीच ज़्यादा बातचीत नहीं होती थी। और आरोही तो एक छोटे-से कस्बे से थी, जहाँ लड़के-लड़कियों का आपस में बात करना भी अच्छा नहीं माना जाता था। जब आरोही नौवीं कक्षा में लड़कियों के स्कूल में आ गई, तो उसे लगा कि अब रवि से उसका पीछा छूट गया। लेकिन दोनों के विषय एक जैसे होने के कारण उनकी मुलाक़ात फिर एक ही कोचिंग सेंटर में होने लगी। एक दिन कोचिंग में दोनों ने एक-दूसरे को देखा, तो रवि हल्का-सा मुस्कुराया और तंज़ भरे लहज़े में बोला, “तुम यहाँ भी मिल गई!” आरोही भी अपनी साइकिल स्टैंड पर लगाते हुए बोली, “हाँ, और क्या! मेरी किस्मत ही ख़राब है!” रवि और आरोही की वैसे तो कोई ख़ास बातचीत नहीं होती थी, लेकिन रवि उसे चिढ़ाने का कोई मौका नहीं छोड़ता था। शायद उसे आरोही की फ़िक्र भी थी, मगर उस समय दोनों में से कोई इस बात को समझ नहीं पाया था। जब आरोही बारहवीं कक्षा में थी, तब एक दिन कोचिंग से लौटते समय रास्ते में उसकी साइकिल गिर गई। उसे चोट लगी और वह ठीक से चल भी नहीं पा रही थी। उस समय रवि ही उसे अस्पताल लेकर गया। फिर उसने अपने साथ की कुछ लड़कियों के साथ उसे घर भी भिजवाया। धीरे-धीरे वक़्त बीतता गया और स्कूल की ज़िंदगी ख़त्म हो गई। अब आरोही को अच्छी पढ़ाई के लिए अपने शहर से बाहर जाना था। उसने दूर एक अच्छे कॉलेज में दाख़िला ले लिया। पहला सेमेस्टर, नए दोस्त, नई जगह और नई ज़िंदगी—इन सबमें आरोही इतनी व्यस्त हो गई कि रवि को लगभग भूल ही गई। कभी कोई दोस्त उसके स्कूल के समूह की तस्वीर देखकर पुराने दोस्तों के बारे में पूछती, तो रवि का ज़िक्र आने पर वह बस इतना कहती, “हम एक साथ पढ़ते थे।” रवि ने भी उससे संपर्क करने की कोई कोशिश नहीं की। एक दिन कॉलेज के काम से आरोही को अपने ही इलाके के एक कॉलेज में जाना पड़ा। वह अपने दोस्तों के साथ वहाँ पहुँची। कैंटीन में बैठकर आरोही और उसके दोस्त समूह में पढ़ाई करने की बात कर ही रहे थे कि पीछे से रवि की आवाज़ आई। “तुम यहाँ भी मिल गई! तुम्हें इसी शहर और मेरे कॉलेज में भी आना था?” आरोही ने पलटकर देखा और चिढ़ते हुए बोली, “लगता है, जब तक पढ़ाई करूँगी, तुमसे पीछा नहीं छूटेगा!” रवि उसकी बात पर मुस्कुराया और हँसते हुए बोला, “जब आ ही गई हो, तो अपना संपर्क नंबर दे दो। मैं तो कम ही घर जाता हूँ। लड़कियाँ तो अक्सर घर जाती रहती हैं। कुछ मँगवाना हुआ, तो कम-से-कम तुम ले आओगी।” आरोही ने उसे घूरते हुए कहा, “मैं क्या कोई कूरियर सर्विस हूँ?” इतना कहकर वह गुस्से में वहाँ से चली गई। आरोही के हॉस्टल पहुँचते ही उसकी रूममेट उसे चिढ़ाते हुए बोली, “मेरे पास भी ऐसा कोई बचपन का दोस्त होता, तो अब तक मैं उसे प्रपोज़ कर चुकी होती!” आरोही ने अपनी छोटी-छोटी आँखों से उसे घूरा और गुस्सा दिखाते हुए बोली, “वह मेरा दोस्त नहीं है!” रूममेट हँस पड़ी। “अच्छा, मैडम! हम समझ गए। अब गुस्सा मत करो। चलो, कुछ खाने चलते हैं।” आरोही भी मुस्कुरा दी। एक दिन आरोही ने फ़ेसबुक पर एक पोस्ट डाली। उस पर सबसे पहला कमेंट रवि का था। थोड़ी ही देर में उसकी फ़्रेंड रिक्वेस्ट भी आ गई। उन दिनों छोटे शहरों में फ़ेसबुक का चलन नया-नया था। हर कोई ज़्यादा-से-ज़्यादा लोगों को दोस्त बनाने में लगा रहता था। आरोही ने भी रवि की रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली। रवि का पहला मैसेज था— “Hi, अभी तक जाग रही हो?” आरोही ने जवाब दिया— “हाँ, तुम क्या सो गए? तुम भी तो जाग रहे हो!” आरोही अपनी आदत से मजबूर थी। रवि से बिना ताना मारे उसकी कभी बात ही नहीं हुई थी। धीरे-धीरे ये छोटे-छोटे मैसेज दिनों और हफ़्तों में बदलने लगे। अब रवि उसे मैसेज करता और आरोही भी जवाब दे दिया करती। मानो दोनों के बीच बातचीत का एक तय समय बन गया हो। एक दिन रवि ने आरोही को मैसेज किया कि उसकी तबीयत ठीक नहीं है और वह कुछ दिनों के लिए घर जा रहा है। उसने यह भी कहा कि घर से कुछ मँगवाना हो, तो बता देना। साथ ही उसने अपना संपर्क नंबर भी भेज दिया। आरोही ने उसे कई मैसेज किए, लेकिन कोई जवाब नहीं आया। अब उसे रवि की फ़िक्र होने लगी थी। आख़िरकार, थोड़ी झिझक के साथ उसने उसे फ़ोन कर ही लिया। फ़ोन उठते ही दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई, “Hello?” आरोही ने जब अपना नाम बताया, तो रवि हँस पड़ा। उसे यक़ीन ही नहीं हो रहा था कि आरोही कभी ख़ुद उसे फ़ोन भी करेगी! उसकी हँसी सुनकर आरोही चिढ़ गई। “ज़्यादा हँसे, तो फिर कभी फ़ोन नहीं करूँगी। और न ही तुम्हारा फ़ोन उठाऊँगी!” रवि अपनी हँसी रोकने की कोशिश करते हुए बोला, “Sorry, sorry! अच्छा, आज फ़ोन कैसे किया?” आरोही ने उसकी तबीयत का हाल पूछा और फिर फ़ोन रख दिया। अब आरोही और रवि की बातचीत फ़ेसबुक से निकलकर कीपैड वाले फ़ोन के मैसेज तक पहुँच गई थी। अब बात करने का कोई तय समय नहीं था। सुबह से रात तक दोनों के फ़ोन मैसेज की आवाज़ से बजते रहते और दोनों कोशिश करते कि एक-दूसरे के मैसेज का जवाब उसी समय दे दें। धीरे-धीरे उनकी बातें छोटी-छोटी बातचीत तक सीमित नहीं रहीं। फ़ोन पर बात होती, तो घंटों चलती—भले ही कोई ख़ास विषय न हो। कभी स्कूल के दिनों को याद करते, तो कभी कोचिंग के किस्से दोहराते और फिर दोनों हँस पड़ते। अब आरोही बेझिझक रवि को किसी भी नाम से बुला सकती थी और रवि भी उसे अपने मन से कोई नाम दे देता। कॉलेज में क्या हुआ, कक्षा में क्या हुआ, परीक्षा कैसी गई, टेस्ट कैसा रहा या हॉस्टल में क्या नया हुआ—जब तक आरोही उसे दिनभर की सारी बातें नहीं सुना देती, उसे चैन नहीं मिलता था। रवि भी उसकी बातें उतने ही ध्यान से सुनता था। बचपन वाली नोक-झोंक अब भी थी, लेकिन आरोही पहले की तरह हर बात पर चिढ़ती नहीं थी। शायद अब उसे रवि की आदत हो गई थी। एक दिन आरोही को रवि से बात करते देखकर उसकी रूममेट ने पूछ ही लिया, “अच्छा, तुम दोनों में से पहले किसने प्रपोज़ किया था?” यह सवाल रवि ने भी फ़ोन पर सुन लिया। आरोही तो जैसे अचानक ख़ामोश ही हो गई। रवि उसे असहज नहीं करना चाहता था। इसलिए कहीं जाने का बहाना बनाकर उसने फ़ोन काट दिया। रूममेट ने फिर पूछा, “तुम कब से उसे पसंद करने लगी?” आरोही कुछ देर उसके सवाल पर चुप रही। फिर हँसते हुए बोली, “हम बस दोस्त हैं। इससे ज़्यादा कुछ नहीं।” रूममेट हँस दी। “मुझसे झूठ बोल रही हो या ख़ुद से?” आरोही मुस्कुराकर बोली, “नहीं, हम बस दोस्त हैं।” रवि सच में उसके लिए एक दोस्त ही था। रूममेट ने फिर सवाल किया, “अच्छा, एक बात बताओ। कौन-सी लड़की अपने किसी लड़के दोस्त से इतनी बातें करती है?” आरोही थोड़ी चिढ़ गई। “मैं उसे पसंद करती हूँ, ठीक है! लेकिन सिर्फ़ एक दोस्त की तरह!” यह बात उसने अपनी रूममेट से तो कह दी, मगर उस रात उसे इसी सवाल ने सोने नहीं दिया। रवि ने भी यह सब सुन लिया था। न जाने वह क्या सोच रहा होगा! आरोही ने कभी ख़ुद से यह सवाल ही नहीं किया था कि रवि क्या चाहता है या उनके रिश्ते को किस नज़र से देखता है। उसने तो रवि के साथ अपने रिश्ते को दोस्ती से आगे कभी सोचा ही नहीं था। इन्हीं ख़यालों में उलझते-उलझते उसकी आँख लग गई। अगली सुबह उसने रवि को कोई मैसेज नहीं किया। रवि की तरफ़ से मैसेज आया भी, तो वह ख़ुद को व्यस्त बताकर बात करने से बचती रही। ऐसे ही दो-तीन दिन गुज़र गए। आख़िरकार, फ़ेसबुक पर उसे ऑनलाइन देखकर रवि ने मैसेज किया— “अब और कितने दिन ऐसे ही बिज़ी रहना है?” आरोही बस उस मैसेज को देखती रही। उससे कोई जवाब नहीं दिया गया। रवि ने फिर लिखा— “हमें बातें साफ़ कर लेनी चाहिए। ऐसे बचने से क्या होगा?” आरोही सफ़ाई देना चाहती थी कि ऐसी कोई बात नहीं है, वह बस व्यस्त है। लेकिन वह कुछ कह नहीं पाई। आख़िर में बस इतना ही लिख सकी— “हाँ।” रवि ने फिर मैसेज किया— “कोई सवाल हो, तो पूछ सकती हो।” आरोही ने मैसेज टाइप किया— “क्या तुमने कभी हमारी दोस्ती को उस नज़र से देखा है?” लेकिन वह उसे भेज नहीं पाई। कुछ पल स्क्रीन पर देखने के बाद उसने मैसेज मिटा दिया। रवि का फिर मैसेज आया— “क्या बात है? बताओ।” इस बार आरोही ने लिख ही दिया— “तुम्हारे लिए दोस्ती क्या है?” रवि का जवाब आया— “जो हमेशा साथ रहे।” आरोही ने कुछ देर बाद पूछा— “और मैं?” इस सवाल के जवाब में रवि ने मैसेज करने के बजाय उसे फ़ोन कर दिया। आरोही ने फ़ोन उठाया। दूसरी तरफ़ से रवि की वही पुरानी, हँसती हुई आवाज़ आई— “ढक्कन, क्या चल रहा है दिमाग़ में?” ढक्कन—रवि प्यार और अपनेपन से आरोही को इसी नाम से बुलाता था। और आरोही भी उसे ढक्कन ही कहती थी। आरोही झिझकी। फिर धीरे से बोली, “मैं आगे चलकर कोई परेशानी नहीं चाहती। बस इतना चाहती हूँ कि हम हमेशा ऐसे ही रहें।” रवि ने पूछा, “आगे चलकर क्या हो सकता है?” आरोही ने जवाब दिया, “अगर हम आगे चलकर बदल गए, तो हमारा अलग होना तय हो जाएगा। लेकिन अगर हम दोस्त रहे, तो हमेशा साथ रहेंगे।” रवि उसकी बात ध्यान से सुन रहा था। फिर हँसते हुए बोला, “वह कैसे?” आरोही कुछ पल चुप रही। फिर बोली, “दोस्ती से कुछ ज़्यादा हुआ, तो ग़लतफ़हमियाँ होंगी, झगड़े होंगे और छोटी-छोटी बातों पर शक होने लगेगा। फिर न दोस्ती बचेगी और न वह रिश्ता। मैं तुम्हें बस अपना दोस्त मानती हूँ। ऐसा दोस्त, जो ज़िंदगी के हर पड़ाव पर मेरे साथ रहे—जैसे बचपन से रहा है।” रवि हँस पड़ा और उसे चिढ़ाते हुए बोला, “लड़की बड़ी हो गई है और समझदार भी!” आरोही भी कहाँ पीछे रहने वाली थी! “हाँ, और क्या! बच्ची थोड़ी ही हूँ!” रवि ने बहुत सहजता से जवाब दिया, “हम हमेशा ऐसे ही दोस्त रहेंगे। अब बिज़ी मत होना!” फ़ोन कटने के बाद आरोही ने सुकून की साँस ली। वक़्त के साथ उनका रिश्ता वैसा ही बना रहा। उनकी बातें भी पहले की तरह चलती रहीं—बिना किसी तय वक़्त के, बिना किसी ख़ास वजह के। लेकिन जब भी कोई तीसरा उन्हें साथ देखता या उनकी बातचीत के बारे में जानता, तो उन्हें सिर्फ़ दोस्त नहीं, दोस्ती से कुछ ज़्यादा ही समझता। एक दिन आरोही ने रवि को फ़ेसबुक पर ऑनलाइन देखा, तो उसे कॉलेज में चल रहे सांस्कृतिक कार्यक्रम की एक तस्वीर भेज दी। तस्वीर में उसने साड़ी पहनी हुई थी। उसने मैसेज किया— “ढक्कन, मैं कैसी लग रही हूँ?” लेकिन उस वक़्त ऑनलाइन रवि नहीं, उसकी दीदी थीं। आरोही बचपन से रवि की दीदी को जानती थी। रवि की आईडी से वह उनसे भी जुड़ी हुई थी और वे भी आरोही को जानती थीं। लेकिन वक़्त के साथ लोगों की सोच बदल जाती है, और कभी-कभी रिश्तों को देखने का नज़रिया भी। रवि की दीदी ने लगभग डाँटते हुए जवाब दिया— “मेरे भाई का नाम रवि है, ढक्कन ”नहीं!” आरोही को उनकी बात बुरी लगी, लेकिन उसने कुछ कहने के बजाय बस माफ़ी माँगी और ऑफ़लाइन हो गई। जब रवि को पता चला कि उसकी दीदी ने आरोही से क्या कहा था, तो उसने उसे समझाने के लिए फ़ोन किया। आरोही ने भी कोई शिकायत नहीं की। बस इतना कहा, “बताया तो होता कि दीदी भी तुम्हारी आईडी ऑनलाइन कर लेती हैं।” लेकिन यह बात उसके मन में अटक गई थी कि आख़िर रवि की दीदी ने ऐसा क्यों कहा। कुछ दिनों बाद आरोही को महसूस होने लगा कि रवि के साथ उसके मैसेज पर अब उसकी दीदी की नज़र रहने लगी है। उसने रवि को मैसेज करना कम कर दिया। जब बात करनी होती, तो कोशिश करती कि फ़ोन पर ही बात हो जाए। एक दिन आरोही ने रवि को मैसेज किया— “क्या कर रहे हो? क्या हम कॉलेज के बाहर मिल सकते हैं?” लेकिन यह मैसेज रवि की जगह उसकी दीदी तक पहुँच गया। रवि की दीदी ने आरोही को फ़ोन किया और उसे डाँटते हुए कहा कि वह उनके भाई की ज़िंदगी में ज़रूरत से ज़्यादा दख़ल दे रही है। उनके मुताबिक़, आरोही के पास कोई और काम नहीं था, इसलिए वह दिनभर उनके भाई को मैसेज करती रहती थी। आरोही कुछ कह पाती, उससे पहले ही रवि की दीदी ने फ़ोन काट दिया। आरोही अभी यह समझने की कोशिश ही कर रही थी कि उसके साथ अचानक यह सब क्यों हो रहा है, तभी उसका सब्र टूट गया। रोते हुए, काँपते हाथों से उसने रवि को मैसेज किया— “रवि, अब मुझे कभी फ़ोन या मैसेज मत करना।” रवि का जवाब आया— “OK।” बस, इतना ही। वह एक छोटा-सा जवाब था, लेकिन आरोही के लिए उसके भीतर बहुत कुछ टूट जाने जैसा था। उसे उस पल समझ ही नहीं आया कि आख़िर हुआ क्या था। उसने तो बस गुस्से और तकलीफ़ में रवि को वह मैसेज भेज दिया था। कहीं न कहीं उसे उम्मीद थी कि रवि उसे समझने की कोशिश करेगा, फ़ोन करेगा, पूछेगा कि आख़िर हुआ क्या है। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। आरोही इंतज़ार करती रही। दिन बीत गए। फिर हफ़्ते गुज़र गए। न कोई मैसेज आया, न कोई फ़ोन। जब भी कोई उससे रवि के बारे में पूछता, वह ख़ामोश हो जाती। कभी-कभी तो वह अपने ख़यालों में इस क़दर खो जाती कि उसे ख़ुद भी समझ नहीं आता कि उसकी ज़िंदगी में क्या चल रहा है। लोगों के सवालों से बचने के लिए उसने उन सभी लोगों से दूरी बना ली, जो कभी उससे और रवि से जुड़े थे। स्कूल के दोस्त, कॉलेज के दोस्त—धीरे-धीरे उसने सबसे संपर्क तोड़ लिया। वह इतनी ख़ामोश हो गई, जैसे अपने ही भीतर कहीं सिमटकर रह गई हो। और उस ख़ामोशी के भीतर एक सवाल अब भी ज़िंदा था—आख़िर उस दिन हुआ क्या था? तभी आरोही का फ़ोन बज उठा। रिंगटोन ने उसे ख़यालों से बाहर खींच लिया। फ़ोन पर संजीव का नाम चमक रहा था। उसने कॉल उठाई, तो संजीव ने पूछा, “घर आने की सारी तैयारियाँ हो गईं या कुछ रह गया है? ज़्यादा थक मत जाना।” आरोही हँसते हुए बोली, “हाँ, सब कर लिया। बस आप तैयार रहना।” इतना कहकर उसने फ़ोन रख दिया। कुछ देर तक वह फ़ोन की स्क्रीन पर संजीव का नाम देखती रही। संजीव—वह इंसान, जिससे आरोही की शादी होने वाली थी। फिर उसकी नज़र दोबारा डायरी के उस पन्ने पर पड़ी, जहाँ रवि का नाम लिखा था। उसके नीचे अब भी ख़ाली जगह थी। आरोही ने पेन उठाया और लिखना शुरू किया— “रवि, बारह साल बीत गए उस पल को, लेकिन वह आज भी मेरी ज़िंदगी में वैसा ही ठहरा हुआ है। अगर हम एक बार ठीक से अलविदा कहकर अलग हुए होते, तो शायद मुझे कभी इतनी तकलीफ़ नहीं होती। मैंने बहुत कोशिश की थी कि तुम्हें अपने साथ एक दोस्त के रूप में बनाए रख सकूँ। तुम साथ होते, तो तुम्हें बताती कि इन बारह सालों में मेरे साथ क्या-क्या हुआ। आज भी जानना चाहती हूँ कि उस पल तुम्हारे साथ आख़िर हुआ क्या था…” यह लिखते-लिखते आरोही का हाथ रुक गया। उसकी आँखों से गिरे आँसू डायरी के उसी पन्ने पर जा ठहरे। कुछ पल तक वह उन शब्दों को देखती रही, जिन्हें लिखने के लिए उसे बारह साल लग गए थे। फिर उसने एक गहरी साँस ली, हल्का-सा मुस्कुराई और डायरी बंद कर दी। ☆अनामकारा
अजनबी रिया जल्दी-जल्दी घर के काम खत्म करने में लगी हुई थी और बार-बार उसकी नज़र घड़ी की तरफ जा रही थी। आज कॉलेज में एक बहुत महत्वपूर्ण सेमिनार होने वाला था, जिसमें कुछ लोग बाहर से और कुछ दूसरे कॉलेज से आने वाले थे। उस सेमिनार की ज़िम्मेदारी रिया और उसके ग्रुप को दी गई थी। 30 साल की रिया में उसकी उम्र से कहीं ज़्यादा ठहराव था। वह हमेशा अपने शांत चेहरे पर एक मुस्कान ओढ़े रहती थी, जो उसकी आँखों की उदासी और दर्द को बखूबी छुपा लेती थी। काम खत्म करने के बाद रिया ने अपने बिखरे बाल सँवारे और कॉलेज के लिए निकल गई। बस में बज रहे एक पुराने गाने ने उसे अचानक उसके पुराने वक़्त में पहुँचा दिया। वही वक़्त, जहाँ रिया अल्हड़ थी, बेफ़िक्र होकर अपनी ज़िंदगी जिया करती थी। उसके लिए उसका प्यार उसकी पूरी दुनिया हुआ करता था। सुबह से लेकर रात तक उसकी ज़िंदगी बस उसी प्यार के चारों तरफ घूमती थी। उसे याद भी नहीं रहा था कि वह खुद भी एक इंसान है, उसकी अपनी भी कोई ज़िंदगी है और उसकी अपनी एक सेल्फ-रिस्पेक्ट भी है। कच्ची उम्र के उस प्यार में रिया सामने वाले के व्यवहार को समझ ही नहीं पाई थी। जिसे वह प्यार समझकर इबादत कर रही थी, शायद दूसरे के लिए वह सिर्फ़ एक टाइम पास था। और जब उसका भरोसा टूटा, तो उसके साथ रिया भी पूरी तरह टूट गई। उसे सँभलने में आठ साल लग गए। इन आठ सालों में रिया उस प्यार के सदमे से पूरी तरह बाहर नहीं आ पाई थी। लेकिन शायद उसी दर्द ने उसकी उम्र से कहीं ज़्यादा उसके भीतर एक ठहराव भर दिया था। बस के अचानक ब्रेक लगने से एक झटका लगा और रिया अपने ख़यालों से बाहर आ गई। तभी उसकी सहेली अंजलि ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा, “रिया, कॉलेज आ गया। उतरना है।” रिया ने अपना सामान सँभाला और बस से उतर गई। कॉलेज पहुँचते ही वह सेमिनार के काम में लग गई। सेमिनार शुरू हुआ तो बाहर से आए लोगों में आकाश भी था। रिया को काम में व्यस्त देखकर उसने उसकी मदद करने की पेशकश की। आकाश लगभग रिया की ही उम्र का था, लेकिन अपनी उम्र के लोगों से थोड़ा ज़्यादा सुलझा हुआ। रिया थोड़ी झिझकी, लेकिन उसके पास उसकी मदद लेने के अलावा कोई रास्ता भी नहीं था। दो घंटे के उस सेमिनार में रिया और आकाश के बीच बस हाय-हैलो हुई और काम को लेकर थोड़ी-बहुत बातचीत। इससे ज़्यादा कुछ नहीं। लेकिन एक महीने चलने वाले उस सेमिनार के कारण अब दोनों की रोज़ मुलाकात होने लगी। रिया से बात करने की पहल अक्सर आकाश को ही करनी पड़ती थी। वह बातचीत की शुरुआत तो करता था, लेकिन रिया की ख़ामोशी को भी उतनी ही इज़्ज़त देता था। एक दिन सेमिनार शुरू होते ही रिया हॉल से उठकर बाहर आ गई। हाथ में कॉफी का कप लिए वह एक तरफ बैठकर अपने ख़यालों में खो गई। तभी आकाश भी वहाँ आ गया। उसने रिया के पास बैठने की इजाज़त माँगी रिया ने अपना दुपट्टा सँभाला और बिना कुछ कहे उसे बैठने की इजाज़त दे दी।आकाश उसके पास बैठ गया। आकाश ने कॉफी की एक सिप लेते हुए पूछा, “आप हमेशा इतना चुप रहती हैं?” जवाब में रिया बस मुस्कुरा दी। आकाश ने फिर पूछा, “आप किस्मत पर यक़ीन करती हैं?” रिया ने उसकी तरफ देखा, हल्का सा मुस्कुराई और बहुत धीमी आवाज़ में बोली, “हाँ।” शायद यह वही पहला जवाब था, जिसने आकाश को उसकी ख़ामोशी के पीछे छुपे सवालों के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया। उसने फिर हल्के अंदाज़ में पूछा, “आप अपनी किस्मत से क्या चाहती हैं?” इस सवाल पर रिया ने आकाश की तरफ देखा। कुछ पल चुप रही और फिर थोड़ी संजीदगी और दबी हुई आवाज़ में बोली, “अपने दिल का सुकून।” आकाश बस उसे देखता रहा। रिया वहाँ से चली गई, लेकिन अपने पीछे आकाश के मन में कई सवाल छोड़ गई। उसकी ख़ामोशी में छुपे दर्द के सवाल। उसकी मुस्कुराती आँखों के किनारों में छुपी उस कहानी के सवाल, जो शायद वह किसी से नहीं कहती थी। धीरे-धीरे रिया भी आकाश के साथ सहज होने लगी। अब वह सिर्फ़ आकाश के सवालों के जवाब नहीं देती थी, बल्कि उससे पलटकर सवाल भी करने लगी थी। कभी-कभी तो ऐसे सवाल कर देती, जिनका जवाब आकाश के पास मुस्कुराने के अलावा कुछ नहीं होता था। एक दिन आकाश ने रिया से पूछा, “आपके according सबसे अच्छा रिश्ता कौन सा होता है?” रिया ने सहजता से जवाब दिया, “हसबैंड-वाइफ... माता-पिता का...” फिर अचानक रुक गई। एक गहरी साँस लेकर बोली, “पिता और बच्चे का रिश्ता कितना उलझा हुआ है।” आकाश, जो उसकी बातें ध्यान से सुन रहा था, थोड़ा रुका और पूछा, “कैसे?” रिया थोड़ी संजीदा हो गई। “पिता और बच्चे दोनों को एक-दूसरे से प्यार होता है, लेकिन फिर भी दोनों एक-दूसरे से कुछ कहने और अपना प्यार जताने में कतराते हैं।” आकाश उसकी बात सुनकर मुस्कुरा दिया। “ये तो समाज ने ही ऐसा बनाया है और ऐसा ही चलता आ रहा है।” रिया ने उसकी तरफ देखा। “आपको ऐसा क्यों लगता है?” आकाश ने कहा, “माँ ही बच्चे को पालती है। पिता घर के बाहर कमाने की responsibility पूरी करता है।” रिया मुस्कुरा दी और हल्के अंदाज़ में बोली, “आपको नहीं लगता, आप समाज की बात कर रहे हैं, लेकिन उसमें आपकी अपनी राय कहाँ है?” आकाश के पास मुस्कुराने के अलावा कोई और रास्ता नहीं था। जाने-अनजाने में आकाश ने रिया के उस मन को छुआ था, जिसे शायद लंबे समय से किसी ऐसे ही स्पर्श की ज़रूरत थी—जो उसे बदलने की कोशिश न करे, बस उसे समझने की कोशिश करे। आकाश ने रिया से कोई वादा नहीं किया था। फिर भी, दोनों एक-दूसरे के उस ख़ालीपन के लिए एक सहज-सा जवाब बन गए थे, जिसे शायद दोनों ने कभी शब्दों में समझाने की कोशिश भी नहीं की थी। आख़िर सेमिनार का अंतिम दिन आ गया। अब दोनों को अपने-अपने रास्ते जाना था। दोनों आख़िरी बार मिले। वैसे ही सहजता से बात हुई। कुछ मुस्कुराहटें थीं, कुछ ख़ामोशियाँ थीं और फिर बिना किसी बड़े अलविदा के दोनों अपने-अपने रास्ते चले गए। न फिर मिलने की कोई चाह थी, न कोई शिकवा-गिला। बस था तो एक शुक्रिया। रिया की ख़ामोशी को जगह देने के लिए। उसकी boundaries का सम्मान करने के लिए। और उस रिश्ते के लिए, जिसका कोई नाम नहीं था, फिर भी उसमें कुछ अधूरा नहीं था। एक ऐसा रिश्ता, जिसे रिया वक़्त के किसी भी दौर में याद कर सके और बिना किसी झिझक के मुस्कुरा सके। ☆अनामकारा
दर्द का अहसास, अपनों का प्यार बच्चों के शोर-शराबे और शादी में गाए जाने वाले गीतों की गूँज के बीच, हर तरफ सिर्फ एक ही नाम गूँज रहा था—रिम्शा! अपने भाई की शादी में रिम्शा कोई कमी नहीं छोड़ना चाहती थी। बिना रुके, बिना थके, वह हर काम के लिए यहाँ से वहाँ दौड़ रही थी। तभी अचानक, भागदौड़ के बीच रिम्शा का पैर सीढ़ियों से फिसला और जैसे वक्त वहीं थम गया। वह चार-पाच सीढ़ियाँ खिसकते हुए नीचे जा गिरी। उसे उठाने के लिए उसकी अम्मी और भाई फौरन दौड़े, लेकिन तब तक रिम्शा हँसते हुए सीढ़ी पर ही उठ कर बैठ गई और सहारा लेकर उठते हुए बोली, "कुछ नहीं, बस फिसल गई," और खुद भी हँस पड़ी। बिना आराम किए, वह फिर से अपने काम में लग गई। शादी निबटने के बाद जब दौड़-भाग खत्म हुई, तब रिम्शा को असली दर्द का अहसास हुआ—वह दर्द जो उसके घुटने में बैठ चुका था। जब अंदर के सारे टेस्ट करवाए गए, तो मालूम हुआ कि एसीएल (ACL) के साथ-साथ उसका घुटना पूरी तरह से डैमेज हो चुका है। डॉक्टर ने फौरन सर्जरी की डेट दे दी। रिम्शा, जो मन से बहुत कोमल और इमोशनल थी, सर्जरी के नाम से थोड़ा डर गई। लेकिन दर्द इतना ज्यादा था कि उसके पास और कोई रास्ता नहीं बचा था। रिम्शा की एक अलग दुनिया: रिम्शा थोड़ी चुप-चाप और अपने कमरे में रहने वाली लड़की थी। वह बहुत जल्दी किसी से घुल-मिल नहीं पाती थी, जिस वजह से अक्सर अपने ही परिवार में खुद को थोड़ा अलग-थलग महसूस करती थी। उसके मन में अक्सर एक छिपा हुआ दर्द रहता था कि शायद कोई उससे उतना प्यार नहीं करता जितना वह सबसे करती है, या कोई उसकी उतनी फिक्र नहीं करता। सर्जरी की एक रात पहले, रिम्शा अपने कमरे में लेट कर छत को घूर रही थी और सोच रही थी कि कैसे सब होगा, वह कैसे चल पाएगी? डर, उलझन और अनगिनत इमोशंस उसके मन में चल रहे थे। सोचते-सोचते ही उसे कब नींद आ गई, पता ही नहीं चला। अगली सुबह रिम्शा भाई, बहन और अम्मी के साथ अस्पताल पहुँच गई। धीरे-धीरे सर्जरी का वक्त आ गया। जब वह ऑपरेशन थिएटर के अंदर जा रही थी, तो सबकी आँखों में उसके लिए बेपनाह दर्द और प्यार साफ़ नज़र आ रहा था। साढ़े-तीन घंटे की लंबी सर्जरी के बाद जब उसे रूम में शिफ्ट किया गया, तो रिम्शा एनेस्थीसिया के असर में थी। उसके सिर पर अम्मी का हाथ आते ही उसे पहली बार यह अहसास हुआ कि वह अकेली नहीं है। परिवार के सभी सदस्य जैसे बस उसकी एक आवाज़ सुनना चाहते थे, लेकिन उस वक्त रिम्शा कुछ बोलने की हालत में नहीं थी। रात के सन्नाटे में जब अस्पताल खामोश हो गया और एनेस्थीसिया का असर कम होने लगा, तब रिम्शा को हर दर्द पाँच गुना ज्यादा महसूस हुआ और दर्द से उसकी तड़प निकल गई। तब उसकी बहन उसका सबसे बड़ा सहारा बनी। रिम्शा की एक हल्की सी आह पर भी वह उसका हाथ थामे उसके पास ही खड़ी रही। अस्पताल के 3 दिन जितने दर्दनाक थे, उतने ही उस परिवार को एक-दूसरे के करीब लाने के लिए जरूरी भी थे। अम्मी को देख कर रिम्शा की आँखें भर आना, भाई का फिक्रमंद होकर पास बैठना, और छोटे भाई-बहन का अपनी अप्पी की एक आवाज़ पर बिना थके, बिना चिढ़े दिन-रात सेवा करना—यह सब देख कर रिम्शा का दिल पिघल गया। कभी-कभी हम अपने सबसे बुरे वक्त में ही अपने उन अपनों को पाते हैं, जिनके लिए हम अक्सर सोचते हैं कि हम उनके लिए जरूरी नहीं हैं या वह हमारे बिना भी खुश रह सकते हैं। सबसे ज्यादा रिम्शा अपनी बहन और छोटे भाई के करीब आई। उसकी बहन ने जिस तरह से दिन-रात उसकी सेवा की, उसके प्यार और समर्पण के सामने रिम्शा मन ही मन हमेशा के लिए उसकी कर्जदार हो गई। एक एहसास: कभी-कभी अपनों के असली प्यार को समझने और महसूस करने के लिए हमें जिंदगी के किसी बड़े दर्द से गुजरना पड़ता है। ☆अनामकारा
मेरी दादी मीनू और सकीना: रूह का रिश्ता यह कहानी एक ऐसे रिश्ते की है जो वक्त, दूरी और इस दुनिया की सरहदों से भी परे है। कुछ लोग सिर्फ हमारी जिंदगी का हिस्सा नहीं होते, बल्कि हमारे वजूद का हिस्सा बन जाते हैं… सितंबर का वह महीना अपनी ऐसी तीखी धूप लिए आता था जो मासूमियत को भी चुभती थी, और दिन की गर्मी जून की तरह कंधों पर बोझ बन कर बैठ जाती थी। इसी ताप्ते मौसम में एक रात, सकीना के घर उनकी पोती, मीनू का जन्म हुआ। पुरानी सोच के दायरों में बांधी दुनिया की तरह सकीना की भी यही ख्वाहिश थी कि उनके घर पहले पोता आए, पर चाहत और किस्मत के फैसलों में जमीन-आसमान का फर्क होता है। आखिरकार, उन्हीं के घर मीनू के रूप में एक ऐसी बरकत उतरी जिसने सभी की सोच को बदल दिया। कई दिनों तक सकीना मीनू से खफा-खफा सी रहीं। लेकिन कोई चाहे कितना भी रूठना चाहे, एक मासूम बच्चे के चेहरे की बे-गुनाही के आगे किसकी चलती है? फिर वह तो उनकी अपनी ही खून, उनकी पोती थी। उधर, सकीना की बहू की तबीयत दिन-ब-दिन गिरने लगी, और इधर भूख से बिलखती मीनू को देखकर आखिरकार सकीना का दादी दिल पिघल गया। जब उन्होंने पहली बार मीनू को अपनी कांपती गोद में उठाया और अपने हाथों से दूध पिलाया, तो जैसे सकीना का सारा गुस्सा और शिकवे मीनू के उन मासूमंसुओं के साथ ही बह कर निकल गए। धीरे-धीरे ही सही, सकीना और मीनू के दरमियान की यह दूरी मिटने लगी। वक्त गुजरता गया और मीनू जब छह महीने की हुई, तो वह सकेना की जिंदगी का एक लाजिम हिस्सा बन चुकी थी। मीनू को अब अपनी मां की गोद से ज्यादा अपनी दादी की गोद में सुकून मिलता था, और सकीना भी अपनी इस छोटी सी पोती को हमेशा सीने से लगा कर रखती थी। जब मीनू ने लड़खड़ाते कदमों से चलना सीखा, तो सकीना का आंचल ही उसका सहारा था—वही आंचल पकड़-पकड़ कर वह न सिर्फ पूरे घर में, बल्कि पूरे गांव की गलियों में घूमती रहती थी। अगर सकीना खेत की तरफ जाती या किसी रिश्तेदार के यहां, तो मीनू भी साये की तरह उनके साथ ही होती। सकीना की बस एक ही कोशिश होती थी—वह मीनू को दुनिया की हर दुख-तकलीफ से बचा कर हमेशा अपने आंचल की छाया में महफूज रखें। लेकिन वक्त के बहाव के आगे भला किसका जोर चला है? जब मीनू की उम्र तालीम हासिल करने और स्कूल जाने की हुई, तो उसे पहली दफा और एक लंबे वक्त के लिए अपनी दादी के इस गर्म-छांव साये से दूर जाना पड़ा। एक बच्चे के मुकाबले उस इंसान के लिए यह जुदाई कहीं ज्यादा दर्दनाक होती है जो उसे अपने आंचल के हिफाजती घेरे में रखता है। मेनु के पास तो स्कूल में दूसरे बच्चों का साथ और नई दुनिया थी, लेकिन सकीना के आंचल से तो उनकी जान, उनकी पोती ही रुखसत हो रही थी। सकीना ने ऊपर से हंसते हुए मीनू को शहर के लिए अलविदा कहा और प्यार से समझा-बुझा कर तैयार किया, लेकिन उन्हें यह अंदाजा नहीं था कि वह मेनु के बिना अपने इस सून-ए-मन्न को कैसे संभाल पाएंगी। शहर पहुंच कर मीनू दिन भर स्कूल की पढ़ाई और दोस्तों के साथ खेलने में मशरूफ रहती, पर जैसे ही शाम ढलती, उसकी मासूम आंखें बस अपनी दादी को ढूंढने लगती थी। वह चाहती थी कि बस एक बार दादी के सीने से लग कर वैसी ही नींद आए और दिन भर का दुख उनके आगे रो कर बांट सके। पर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था; उनका अलग होना तय हो चुका था। वक्त के साथ-साथ दोनों को इस जुदाई की आदत पड़ने लगी। मीनू को आदत तो हो गई, पर उसके अंदर एक खामोशी उतर आई थी। दादी के बिना अब वह पहले की तरह बे-बाक नहीं बोलती थी। अगर कभी स्कूल में कोई चोट लगती या दिल पर कोई तकलीफ गुजरती, तो वह किसी से कुछ नहीं कहती थी; बस चुपचाप अकेले में जी भर कर रो लेती और हर पल बस अप्रैल के आने का इंतजार करती रहती थी। और यहां सकीना भी मीनू के घर लौटने के दिन गिनती रहती थी। उसके आने की खुशी में सकीना ने पहले से ही ढेर सारे मनपसंद खाने के सामान जोड़ कर रखने शुरू कर दिए थे। अप्रैल से जून तक के ये दो महीने उस जलती हुई गर्मी में भी सकेना और मीनू के लिए किसी ठंडक से कम नहीं होते थे। वही पुराना सिलसिला एक बार फिर जिंदा हो जाता—रात को दादी के साथ सोना, उन्हीं से पुरानी कहानियां सुनना, सुबह दादी के दस बार आवाज देने पर भी बिस्तर न छोड़ना, और पूरा दिन दादी का आंचल पकड़ कर उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमना। मीनू को दादी के हाथ की हर चीज से बे-पनाह मोहब्बत थी, पर दादी के हाथों की बनी प्याज की चटनी उसकी सबसे बड़ी कमजोरी थी, जिसे सकीना भी बड़ी चाह से रोज बनाया करती थी। यही सिलसिला चलते-चलते जाने कितने साल बीत गए। बड़ी होती हुई मीनू को अब आगे की पढ़ाई के लिए किसी दूसरे शहर के कॉलेज जाना था। शहर और गांव की लंबी दूरी ने अब सकीना और मीनू के दरमियान भी एक गहरा फासला खड़ा कर दिया था। उम्र के इस पड़ाव पर खड़े होकर बूढ़ी होती सकीना को अब फोन की आवाज भी साफ सुनाई नहीं देती थी, और मीनू के लिए भी अब पहले की तरह बारंबर गांव आना मुमकिन नहीं रहा था। जब भी कोई शहर से गांव आता, सकीना की थकी और बूढ़ी आंखें बस मीलों दूर से मीनू को खोजती और हर आने वाले से एक ही सवाल पूछती, "मीनू नहीं आई?" जब मीनू नहीं पहुंच पाती थी, तो सकेना के चेहरे और उनके कमजोर मन पर एक ऐसी गहराई वाली उदासी छा जाती थी जो उन्हें पल भर में और ज्यादा बूढ़ा कर देती थी। उन दिनों सकीना की बस एक ही आखिरी ख्वाहिश बची थी—मीनू की शादी देखना। पर मीनू अपनी पढ़ाई और सपनों को पूरा करना चाहती थी। अब दोनों की मुलाकातें सालों में बस एक-दो दिन के लिए सिमट कर रह गई थीं। और यह एक-दो दिन भी ऐसे होते थे जैसे सकीना फिर से थोड़ी जवान हो गई हो और मीनू एक बार फिर से वही छोटी सी बच्ची बन गई हो। मीनू को सकीना के आगे कभी कुछ बनने की या खुद को बदलने की जरूरत नहीं पड़ती थी—वह बस मीनू रहती थी, सकीना का आंचल पकड़ने वाली वही मासूम पोती। वक्त अपने नियम के मुताबिक चलता गया और सकीना की उम्र के साथ उनकी सेहत भी कमजोर पड़ने लगी। बीमारी ने जब उनके जिस्म को पूरी तरह जकड़ लिया और तबीयत में कोई सुधार नहीं आया, तो उन्हें मजबूरन हॉस्पिटल में एडमिट करना पड़ा। उस उम्र और बे-धड़क बीमारी के कहर में सकेना अपने बाकी परिवार के चेहरे तक भूल चुकी थी, पर एक नाम था जो उनके होठों और उनकी रूह पर अब भी ताजा था—मीनू। शायद यह नाम उनकी आखिरी सांसों का भी हिस्सा बन चुका था। जब कुछ हालत संभली और डॉक्टर ने उम्मीद छोड़ते हुए उन्हें घर ले जाने की सलाह दी, तो सकीना को वापस ले आया गया। घर आने पर उनकी बहू, पोतों और बच्चों ने उनकी सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन जब सकीना दर्द से कराहती, तो उनसे ज्यादा तड़प मीनू के दिल में मच जाती थी। एक शाम सकीना ने बड़े जिद्दो-भर लहजे में गुड़ से बने मीठे चावल खाने की ख्वाहिश जाहिर की। सकीना को हमेशा से मीनू के हाथ के बने मीठे चावल सबसे ज्यादा पसंद थे। मीनू ने बिना वक्त गंवाए, बड़े प्यार से वह चावल बनाए और अपने कांपते हाथों से दादी को खिलाए। उस वक्त मीनू के जेहन में यह ख्याल तक नहीं आया था कि वह अपनी दादी को जिंदगी का आखिरी निवाला खिला रही है। बीमारी के आखिरी दौर में सकीना बिल्कुल एक छोटे बच्चे की तरह हो गई थीं—जिसे जो चीज चाहिए, वह बस उसी वक्त चाहिए होती थी। इसी बचकानी जिद के चलते उन्होंने गांव जाने की जिद पकड़ ली, शायद इसलिए भी क्योंकि उनकी रूह मीनू के इस मोह और प्यार से बंधी हुई थी। और मीनू भी कहां मानने वाली थी; वह भी दादी का हाथ ऐसे थामे रखी थी मानो अपनी इस पूरी दुनिया को कहीं जाने ही न देना चाहती हो। फिर एक सुबह, अचानक पांच बजे मीनू का फोन रिंग हुआ। गांव से आती उस कॉल को देखकर मीनू का दिल एक पल के लिए बैठ गया। कांपते हाथों से फोन उठाते ही दूसरी तरफ से एक सिसकती हुई आवाज ने वह सच बोल दिया जिसे सुनने की ताकत मीनू के पास नहीं थी—दादी अब नहीं रहीं! मीनू ने बस इतना कहा, "हम निकलते हैं," और फोन रख दिया। वह किसी गहरे और सुन्न सदमे में उतर चुकी थी जहां बाहर की दुनिया की कोई आवाज नहीं पहुंच रही थी। वह इस कौरवे सच को अपने दिल में उतारने के बजाय उसे गलत साबित कर देना चाहती थी। बिना किसी से एक लफ्ज बोले, बिना एक भी आंसू बहाए, वह खामोशी से अपनी पैकिंग में जुड़ गई। गांव पहुंच कर देखा तो घर के अंदर और बाहर एक ऐसा बोझ-हल सन्नाटा छाया हुआ था जो चीख-चीख कर बता रहा था कि अब वह इस घर में अकेली पड़ चुकी है। दरवाजे की देहरी पर आकर उसके कदम ठिठक गए। चारों तरफ अपनों को रोते देख कर उसने अपने कदम तेज कर दिए। पहले जब भी वह यहां आती थी, तो "दादी, दादी" पुकारती हुई सीधे उनके कमरे की तरफ दौड़ती थी। लेकिन आज, इस बार, वह दादी के कमरे से बचते हुए, आंगन को पार करके सीधे घर के सबसे पिछले वाले कमरे में चली गई और खुद को किसी काम में उलझा लिया। मीनू आज अपने हिस्से का हर काम खुद कर लेना चाहती थी, शायद इसलिए क्योंकि वह सबकी तरस खाई हुई नजरों से बचना चाहती थी, या फिर सच तो यह था कि वह खुद से ही भाग रही थी। तभी उसकी बुआ ने आगे बढ़ कर मीनू को अपनी बाहों में कस लिया और रोते हुए बोलीं कि अब उनकी दादी नहीं रहीं। उस एक आगोश के साथ ही मीनू का वह आखिरी सहारा भी बिखर गया जिसे वह अपनी ताकत मान कर बैठी थी, और उसके साथ मीनू का अंदर का घबराया हुआ बच्चा भी टूट गया। वह बेतहाशा फूट-फूट कर रोने लगी, बिल्कुल वैसे जैसे एक छोटा बच्चा अपनी मां के बिछड़ने पर बिलखता है। सबकी आंखें नम थीं, सबके दिल में बस एक ही सब्र था कि आखिरकार दादी को इस लंबी तकलीफ और दर्द से आजादी मिल गई। मीनू भी इस सच से अनजान नहीं थी कि अब दादी को तकलीफ नहीं होगी, पर वह अपने इस नादान दिल को यह कैसे समझाए कि अब दादी सचमुच कभी लौट कर नहीं आएंगी, और न ही कोई उसे कभी प्यार से चुप करवाएगा। जब सकीना को आखिरी अलविदा कहने के लिए पूरा परिवार और सभी रिश्तेदार इकट्ठे हुए, तो मीनू बिना पलक झपकाए बस एक-टक अपनी दादी को देखे जा रही थी। वह उनके चेहरे की हर लकीर को अपनी आंखों में हमेशा के लिए कैद कर लेना चाहती थी ताकि वह उनसे कभी जुदा न हो सकें। और जब सकीना का जनाजा घर से रुखसत हुआ, तो हर कोई इस दर्द में रो रहा था कि उनके सर से किसी की मां, किसी की दादी, तो किसी की भाभी का साया उतर गया है। लेकिन मीनू का दिल चीख-चीख कर उसे यह अहसास करवा रहा था कि उसके सर से सिर्फ एक साया नहीं, बल्कि वह हिफाजत छिन गई है जो उसे कभी बड़ा होने ही नहीं देना चाहती थी। एक ही पल में मीनू सब के बीच रह कर भी दुनिया की सबसे अकेली और लाचार लड़की बन चुकी थी। उसे लग रहा था कि दादी की गोद, बच्चों की तरह उनसे लड़ना-झगड़ना, उनकी डांट और वह बेशुमार प्यार सब कुछ एक ही लम्हे में उससे छिन गया है और उसे जबरदस्ती एक समझदार और अकेली औरत बना दिया गया है—क्योंकि अब वहां कोई नहीं बचा था जिसके सामने वह बे-खौफ होकर बच्चों की तरह जिद कर सके, मनमर्जी कर सके। धीरे-धीरे दिन ढल गया और एक-एक कर सभी रिश्तेदार अपने घरों को लौट गए। तन्हा बैठी मीनू बस चारों तरफ अधूरी नजरों से दादी को ढूंढ रही थी। आज मीनू की इन थकी आंखों में दूर-दूर तक नींद का कोई नाम-ओ-निशान नहीं था। उसके अंदर एक अनजाना सा डर बैठा था—अगर वह सो गई और सुबह उठ कर दादी को वहां न पाई, तो वह इस दर्द को कैसे सहेगी? बरसों से यही तो दस्तूर चला आ रहा था कि गांव आने के बाद जब भी मीनू सोती थी, दादी हमेशा उनके पास बैठी रहती थीं ताकि जब मीनू की आंख खुले और वह दादी को सामने न पाए, तो किसी डर से घबरा न जाए। बचपन में यह उसकी हिफाजत थी, और बाद में यह सकीना की एक आदत बन चुकी थी। पर आज, पहली बार, मीनू बिल्कुल अकेली थी। आखिरकार मीनू ने धीरे-धीरे अपने दिल को इस कदरत-ए-खुदा के आगे झुकाने की कोशिश की और खुद को समझाया कि शायद उनकी दादी की रूह को सुकून इसी आजादी में मिल सकता है। उसने उनके लिए दुआ मांगी, ताकि वह जहां भी हों, सुकून से रहें। लेकिन उसके बाद एक अजीब सा सिलसिला शुरू हुआ। उस दिन के बाद से मीनू के पैरों में एक अनोखा और गहरा दर्द बैठ गया—एक ऐसा दर्द जो बड़े से बड़े इलाज और दवाइयों के बाद भी ठीक होने का नाम नहीं ले रहा था। जब भी मीनू को वह दर्द हद से ज्यादा तकलीफ देता, सकीना अक्सर उसके सपने में चली आती और प्यार से अपना ख्याल रखने और किसी अच्छे डॉक्टर से इलाज करवाने की हिदायत देती। यह सिलसिला लगातार छह महीने तक चलता रहा, और हर बार सपने में दादी को देख कर मीनू को एक सुकून सा मिल जाता कि कम से कम उनकी दादी उन्हें छोड़ कर कहीं दूर नहीं गई हैं, वह आज भी उनसे मिलने आती हैं। आखिरकार, एक रोज डॉक्टर ने मीनू को सर्जरी करवाने की आखिरी सलाह दी। यह कोई आम सलाह नहीं थी, बल्कि उसके पैर के उस पुराने दर्द से हमेशा के लिए नजात पाने का एक ही रास्ता था, क्योंकि मीनू का लिगामेंट अंदर से पूरी तरह डैमेज हो चुका था। अगली ही सुबह मीनू का ऑपरेशन होना तय था। उस रात, एक बार फिर सकीना खामोशी से मीनू के सपने में आईं। लेकिन इस बार उन्होंने मीनू को कोई नसीहत या हिदायत नहीं दी; वह आईं, बिना एक लफ्ज बोले मीनू को अपनी बाहों में कस कर गले लगा लिया और चुपचाप वहां से चली गईं। मीनू घबरा कर उस सपने से जाग गई, पर हम सब जानते हैं कि सपने हकीकत की तरह रुकते नहीं हैं—हम चाहे जितनी भी कोशिश कर लें, उस गुजरे हुए लम्हे या सपने में वापस नहीं लौट सकते। मीनू भी चाह कर उस दरवाजे पर फिर नहीं जा सकी। अगली सुबह मीनू की सर्जरी सफल रही और वक्त के गुजरने के साथ उसका वह दर्द भी हमेशा के लिए उसकी जिंदगी से रुखसत हो गया। पर उसके साथ-साथ सकीना भी हमेशा के लिए चली गईं। उस रात के बाद से सकीना कभी दोबारा मीनू के सपने में नहीं आईं—मानो सकीना सिर्फ और सिर्फ आखिरी बार अपनी पोती को उस फिजिकल और रूहानी दर्द से महफूज करने और उसको विदा करने आई थीं, और जब उसके पैर का दर्द हमेशा के लिए मिट गया, तो दादी का यह फर्ज भी पूरा हो गया। एक एहसास “कुछ रिश्ते वक्त और जिस्म के दायरों से कहीं ज्यादा आगे के होते हैं... यह वह पक्का और अनमोल बंधन है जो सांसें थम जाने और दुनिया बदल जाने के बाद भी कभी कमजोर नहीं पड़ता।” ☆अनामकारा
सपनों की कीमत एक लड़की की पहचान, उसके संघर्ष और समाज की तयशुदा परिधि की कहानी बाहर से आती हल्की-सी ठंडी हवा और रात की चाँदनी से कमरा हल्का-हल्का रोशन हो रहा था। पर्दे हवा से टकराकर जैसे कोई धीमी-सी धुन बना रहे थे। चाँदनी की रोशनी कमरे में लगे उन नोट्स पर पड़ रही थी, जिन्हें कभी रोशनी ने बड़े उत्साह से बनाया था। कभी यही नोट्स उसकी मेहनत और उसके सपनों की गवाही देते थे। लेकिन आज उन्हें देखते हुए उसकी आँखें जैसे किसी और ही कहानी को बयान कर रही थीं। आँखों में आँसू नहीं थे, फिर भी लगता था जैसे कोई सैलाब भीतर आकर थम गया हो। सामने टेबल पर रखी कुछ तस्वीरें उसके आने वाले जीवन की ओर एक नया रास्ता दिखा रही थीं। नया रास्ता.. या अपने सपनों को समेटकर किसी और के सपनों को सजाने की जिम्मेदारी? रोशनी भारी मन से उठी और एक-एक कर अपनी किताबें समेटकर बॉक्स में रखने लगी। किताबें उठाते हुए उसकी उँगलियाँ कई बार ठहर जातीं। कभी किसी किताब के पन्ने पर उसकी नजर टिक जाती, कभी किसी नोट पर। इन किताबों के बीच बैठकर उसने न जाने कितनी रातें गुजारी थीं। कभी इन्हीं पन्नों में उसे अपना आने वाला कल दिखाई देता था। आज वही पन्ने उसके सामने थे, लेकिन उसका वह कल कहीं धुंधला पड़ चुका था। आँखों से गिरते आँसू उसके हाथों की रफ्तार को बार-बार रोक रहे थे। फिर भी वह चुपचाप किताबें समेटती रही। उसी दौरान उसकी नजर सामने रखी एक पुरानी फोटो पर पड़ी। फोटो में वह मुस्कुरा रही थी। उस उम्र की मुस्कान, जिसमें भविष्य को लेकर डर कम और सपनों को लेकर भरोसा ज्यादा होता है। रोशनी कुछ पल उस तस्वीर को देखती रही। फिर उसने नजरें फेर लीं। जब आखिरी किताब बॉक्स में रखकर वह टेबल के पास पहुँची, तो सामने रखी तस्वीरों पर उसकी नजर ठहर गई। गले में कुछ अटक-सा गया। मन के किसी कोने से एक सवाल उठा—अगर एक लड़की सरकारी नौकरी हासिल न कर पाए, तो क्या उसके सारे सपने भी खत्म हो जाते हैं? वह वापस बिस्तर पर आ बैठी और अपनी डायरी के पन्ने पलटने लगी। एक-एक पन्ने पर उसकी जिंदगी का कोई न कोई हिस्सा दर्ज था—कहीं खुशी, कहीं उदासी, कहीं ऐसे सपने जिन्हें उसने कभी किसी से कहने की हिम्मत तक नहीं की थी। एक पन्ने पर आकर उसका हाथ अचानक रुक गया। वह उसके उस बिजनेस आइडिया का पन्ना था, जो कभी उसकी आँखों की चमक हुआ करता था। उसने उँगलियों से उस पन्ने को धीरे से छुआ। और फिर उसे वह दिन याद आ गया। वह डरी हुई थी, लेकिन उम्मीद उससे कहीं ज्यादा थी। उसने घरवालों के सामने बैठकर पहली बार अपने बिजनेस आइडिया के बारे में बताया था। उसे लगा था कि उसका परिवार उसे समझेगा। आखिर वह पढ़ी-लिखी फैमिली से थी। शायद उसे अपने सपने के लिए बहुत ज्यादा समझाना नहीं पड़ेगा। लेकिन पापा और भाई की आवाज़ ने उसकी उम्मीद वहीं रोक दी थी। "सीधी-साधी पढ़ाई तो हो नहीं रही और बिजनेस करोगी?" भाई हँस पड़ा था। रोशनी भी उस वक्त हल्का-सा मुस्कुराने की कोशिश कर रही थी। लेकिन वह मुस्कान ज्यादा देर नहीं टिक सकी। वह बात मज़ाक में कही गई थी या ताने में, रोशनी आज तक तय नहीं कर पाई थी। लेकिन इतना जरूर जानती थी कि वह सीधे उसके दिल पर लगी थी। वह पढ़ाई में अपने भाई-बहनों जितनी अच्छी नहीं थी। शायद उसे पढ़ाई उतनी पसंद भी नहीं थी। लेकिन क्या इसका मतलब यह था कि उसके भीतर कोई सपना नहीं हो सकता था? कुछ दिन उसने रोया। कभी डायरी खोलती, कभी बंद कर देती। कभी अपने बिजनेस आइडिया को देखती और सोचती कि शायद किसी दिन घरवाले मान जाएँगे। फिर धीरे-धीरे उसे समझ आने लगा कि बिजनेस के लिए परिवार को मनाना आसान नहीं होगा। एक दिन बातों-बातों में उससे यह भी कह दिया गया—"हम तुम्हारी शादी करें या बिजनेस करवाएँ? इतने पैसे नहीं हैं कि तुम पर फालतू में खर्च करें। हाँ, अगर सरकारी नौकरी की तैयारी करनी है तो कोई दिक्कत नहीं।" उस दिन रोशनी कुछ नहीं बोली। बस अपने कमरे में आकर देर तक चुप बैठी रही। उसने डायरी खोली। बिजनेस वाले पन्ने को देखा। फिर धीरे से उसे बंद कर दिया। उस दिन उसे पहली बार लगा कि उसके सपने के लिए भी जैसे कोई कीमत तय कर दी गई थी—सरकारी नौकरी हो तो सपना सही है नहीं तो सपना ही ठीक नहीं। उसके सामने अब अपने सपने तक पहुँचने का जैसे एक ही रास्ता बचा था—सरकारी नौकरी। अगले ही दिन उसने अपने कमरे को किताबों के कमरे में बदल दिया। टेबल पर किताबें थीं। दीवारों पर नोट्स। और आँखों के सामने एक ही मंज़िल—सरकारी नौकरी। वह अपने सपने को बचाने की आखिरी कोशिश करना चाहती थीं। उसने खुद को पूरी तरह पढ़ाई में झोंक दिया। दिन किताबों के बीच गुजरते और रातें आने वाले कल की चिंता में। उसने कई परीक्षाएँ दीं। कुछ में सफल भी हुई, लेकिन मंज़िल हर बार जैसे एक कदम आगे खिसक जाती। कभी परीक्षा समय पर नहीं हुई। कभी कुछ अंकों से बात रह गई। कभी परिणाम ने उसका साथ नहीं दिया। और कभी उसे खुद समझ नहीं आता था कि आखिर कमी कहाँ रह गई। दो-तीन साल कब बीत गए, उसे पता ही नहीं चला। हर बार रिजल्ट के दिन वह उम्मीद लेकर स्क्रीन के सामने बैठती। नाम खोजती। कुछ सेकंड के लिए साँस रोक लेती। फिर स्क्रीन पर अपना नाम न देखकर धीरे से फोन नीचे रख देती। धीरे-धीरे उसे असफलता से ज्यादा डर इस बात का लगने लगा कि अगली बार घरवालों के सामने क्या कहेगी। वह अंदर ही अंदर टूट रही थी। लेकिन घरवालों के लिए तस्वीर कुछ और थी। एक शाम पापा ने किसी रिश्तेदार से फोन पर कहा—"मेहनत तो बहुत कर रही है। बस नौकरी लग जाए तो सब ठीक हो जाएगा।" रोशनी पास ही बैठी थी। उसने कुछ नहीं कहा। बस अपने हाथ में पकड़ी किताब को और कसकर पकड़ लिया। उसे अचानक लगा, जैसे उसकी सारी मेहनत का मतलब सिर्फ एक परिणाम तक सिमट गया हो। लेकिन उसने फिर किताब खोल ली। क्योंकि उसके पास और रास्ता था ही कहाँ? कुछ ही दिनों बाद रोशनी के लिए जैसे एक और इम्तिहान की तैयारी होने लगी—उसकी शादी। जब उसने परिवार से कहा कि वह अभी और पढ़ना चाहती है, तो उसे उम्मीद थी कि कम से कम इस बार उसकी बात सुनी जाएगी। आखिर उसने पिछले दो-तीन साल अपनी पूरी मेहनत लगा दी थी। लेकिन जवाब वही नहीं था जिसकी उसे उम्मीद थी। "इतनी बड़ी उम्र तक कौन पढ़ता है? हमने पढ़ाया, तुम्हारी नौकरी नहीं लगी तो क्या शादी नहीं करोगी? नौकरी तो होती रहेगी, शादी जरूरी है। आखिर समाज में भी तो जवाब हमें देना होता है। तुम्हें क्या?" रोशनी चुप रही। उसने कुछ कहने के लिए होंठ खोले, लेकिन आवाज़ बाहर नहीं आई। उसे अचानक याद आया—कुछ साल पहले जब उसने बिजनेस की बात की थी, तब भी उसे यही समझाया गया था कि पहले सरकारी नौकरी। उसने वह रास्ता भी चुना था। अपनी पसंद छोड़कर पूरी मेहनत भी की थी। लेकिन अब जब उस रास्ते पर मंज़िल नहीं मिली, तो उसके लिए एक नया रास्ता चुन लिया गया था। इस बार उसकी पसंद पूछे बिना। तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। "रोशनी..." वह जल्दी से अपनी आँखें पोंछकर उठी और दरवाज़ा खोलने चली गई। सामने माँ खड़ी थीं। उनके हाथ में वही तस्वीरें थीं, जिन्हें रोशनी कुछ देर पहले टेबल पर देख रही थी। माँ ने कमरे में आते हुए सहजता से पूछा—"बेटा, कोई पसंद है या नहीं? वैसे दो-तीन दिन में कुछ लोग तुम्हें देखने आने वाले हैं।" रोशनी कुछ पल माँ को देखती रही। उसके मन में आया—पूछूँ, तो फिर मेरी पसंद क्यों पूछ रही हो, जब सब पहले से तय हो चुका है? लेकिन कुछ सवाल ऐसे होते हैं, जिन्हें पूछने की हिम्मत इंसान के अंदर धीरे-धीरे खत्म हो जाती है। उसने तस्वीर की तरफ देखा। फिर माँ की तरफ। और बस हल्का-सा सिर हिला दिया। "हाँ.." माँ मुस्कुराईं। तस्वीर टेबल पर रखकर वह कमरे से बाहर चली गईं। दरवाज़ा बंद हुआ। कमरे में फिर वही ठंडी हवा भरने लगी। रोशनी कुछ देर दरवाज़े को देखती रही। फिर धीरे से वापस बिस्तर पर आकर लेट गई। छत को देखते हुए उसके मन में एक और सवाल उठने लगा—अगर उसका भाई नौकरी नहीं करता, तो क्या उसके सपने खत्म हो जाते? नहीं। शायद उसके पास और रास्ते होते। वह बिजनेस करना चाहता तो परिवार उसके बारे में सोचता। कोई काम शुरू करना चाहता तो उसे थोड़ा समय दिया जाता। असफल होता तो शायद उसे फिर कोशिश करने का मौका मिलता। लेकिन रोशनी? उसके लिए हर रास्ते के बीच एक ही शब्द जैसे खड़ा था—नौकरी। पहले नौकरी। फिर अपने फैसले। फिर अपने सपने। फिर शायद यह तय करने का अधिकार कि शादी कब करनी है, क्या करना है और किस तरह की जिंदगी जीनी है। रोशनी ने करवट बदली। उसे यह बात गलत नहीं लगती थी कि अपने पैरों पर खड़ा होना जरूरी है। गलत बस यह लगता था कि उसके अपने फैसलों की कीमत उसकी नौकरी से क्यों तय की जा रही थी। कुछ देर बाद वह उठकर टेबल के पास गई। वही पुरानी तस्वीर अब भी वहीं रखी थी। और उसके पास उसकी डायरी। रोशनी ने डायरी खोली। वही पुराना पन्ना सामने था। बिजनेस आइडिया। उसने कुछ देर उस पन्ने को देखा। फिर धीरे से डायरी बंद कर दी। कुछ पल वह वैसे ही खड़ी रही। फिर उसकी नजर उस बॉक्स पर गई जिसमें उसने अपनी सारी किताबें रख दी थीं। वह नीचे बैठी। बॉक्स खोला। सबसे ऊपर रखी किताब बाहर निकाली। उसने किताब को देखा। इस बार वापस नहीं रखा। वह किताब लेकर टेबल पर आ बैठी। डायरी खोली। बिजनेस वाले पन्ने के बाद एक खाली पन्ना था। रोशनी ने पेन उठाया। कुछ देर तक खाली पन्ने को देखती रही। फिर उसने पहली बार उस पन्ने पर किसी परीक्षा, नौकरी या शादी के बारे में नहीं लिखा। उसने सिर्फ इतना लिखा—"मुझे अपनी जिंदगी के बारे में क्या चाहिए?" पेन कुछ पल रुका। फिर उसके नीचे उसने एक और शब्द लिखा—“मैं”। खिड़की से आती ठंडी हवा ने डायरी के पन्ने को हिला दिया। रोशनी ने हाथ रखकर उसे थाम लिया। सामने रखी पुरानी तस्वीर में वह लड़की अब भी मुस्कुरा रही थी। वही लड़की, जिसके सपने कभी बहुत बड़े नहीं थे। बस अपने थे। शायद जिंदगी ने उसके बहुत से रास्ते बदल दिए थे। शायद कुछ सपने पीछे छूट गए थे। लेकिन पहली बार उसे लगा—हर सपना पूरा करना जरूरी नहीं। उसने डायरी बंद नहीं की। पेन हाथ में ही रखा। और उस रात रोशनी ने पहली बार किसी नौकरी के परिणाम का इंतज़ार नहीं किया। उसने अपने अगले पन्ने का इंतज़ार किया। एक एहसास कभी-कभी अपनों के लिए रास्ते चुनते-चुनते हम यह भूल जाते हैं कि शायद उन्हें किसी तय रास्ते की नहीं, अपने रास्ते को चुनने की आज़ादी चाहिए। ☆ अनामकारा
जिम्मेदारी में पीछे छूटे वजूद "यह कहानी किसी घर या किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि उन अनकही भावनाओं का एक आईना है जो अक्सर रसोई की चारदीवारी में दब जाती हैं। इसका उद्देश्य किसी पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि एक सकारात्मक बदलाव की शुरुआत करना है।" रश्मि सुबह से घर के काम में लगी हुई थी। कभी किचन से आती कुकर की सीटी पर वहाँ भागती, तो कभी कमरे में ऑफिस के लिए तैयार होते पति की आवाज़ पर उसके काम करने के लिए जाती। साथ में सास को दवाई देना और बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना—रश्मि, जो बस 30 साल की है, लेकिन जिम्मेदारियाँ उठाते-उठाते जैसे 50 साल की हो गई हो। उस घर के लिए रश्मि एक इंसान से ज़्यादा एक 'टाइम-मशीन' थी, जिसमें बस समय सेट कर दिया जाता था और फिर उसका इस्तेमाल करने वाले उसे भूल जाते थे। आज छुट्टी का दिन था, घर में सुकून और शांति थी, लेकिन यह सब घर से बाहर जाने वालों के लिए था, रश्मि के लिए नहीं। रश्मि अपने तय समय के अनुसार उठकर किचन में सबके लिए नाश्ता बना रही थी। किचन से आती पराठों की खुशबू और चाय से अदरक की महक रश्मि के मन को सुकून दे रही थी। घर की स्त्रियाँ बहुत मन से सबके लिए खाना बनाती हैं, शायद उसमें वह प्यार भी घुल जाता है जो वे कह नहीं पातीं, और उसी में उन्हें खुशी भी मिलती है। सुबह सब साथ में नाश्ता कर रहे थे। पति हाथ में अखबार लिए बैठा था। रश्मि, जो सबसे पहले उठी थी, बच्चों को नाश्ता करवा रही थी। नाश्ते की प्लेटों के टकराने की आवाज़ के बीच पति ने अखबार पलटते हुए खुशी से अपनी माँ से कहा, "माँ, आज-कल लड़कियाँ कहाँ से कहाँ जा रही हैं! देखिए, पेपर में एक लड़की के बारे में लिखा है जो कभी एक छोटे से गाँव से थी, आज वो बिज़नेस वूमन बन गई है। यह सुनकर रश्मि जैसे और चुप हो गई। वह सोचने लगी, "मैंने भी M.Com किया है। क्या हो अगर मैं भी कोई बिज़नेस करना चाहूँ? क्या शादी से पहले या बाद में मैंने यह बात की होती, तो क्या ये भी वैसे ही खुश होते? क्या ये मेरी जिम्मेदारियों में हाथ बँटाते?" तभी रश्मि का बेटा, जो आँगन में खेल रहा था, उसकी गेंद से सामने वाली खिड़की का काँच टूट गया। उस आवाज़ से रश्मि ख्यालों से बाहर आई। सास कुछ कहती, उससे पहले ही पति ने अखबार टेबल पर पटकते हुए कहा, "क्या यार रश्मि! तुम बच्चों पर ध्यान नहीं देती, मैं तो ऑफिस में व्यस्त रहता हूँ।" रश्मि को यह बात सीधे दिल पर जा लगी। वह चाह कर भी कुछ न बोल पाई। अपनी जगह से उठी और टूटी हुई उम्मीदों के साथ टूटा हुआ काँच समेटने लगी, फिर किचन में बाकी काम निपटाने चली गई। सास यह सब देख रही थी, वह कुछ नहीं बोली, बस रश्मि को देखती रही। शाम को जब सब चाय पी रहे थे और अपनी छुट्टी का आनंद ले रहे थे, रश्मि फिर शाम के खाने की तैयारी और बच्चों के काम में उलझी हुई थी। तभी सास ने चाय का कप रखते हुए बेटे से कहा, "बेटा, कल मैं रश्मि के साथ अपने मायके जा रही हूँ। शाम में आऊँगी। तुम बच्चों और घर का ख्याल रखना। "यह सुनकर बेटा चौंक गया और कल के ढेर सारे कामों की लिस्ट गिनाते हुए बोला, "मैं नहीं देख पाऊँगा।" रश्मि ने सरलता से कहा, "नहीं माँ, आप चले जाइए, घर ये नहीं देख पाएंगे।" लेकिन सास अपनी ज़िद पर थी। आख़िरकार बेटे को उनकी बात माननी पड़ी। रश्मि सुबह 3 बजे उठी और जल्दी-जल्दी दिन भर के सारे काम निपटा दिए—खाना, साफ़-सफाई, बच्चों के कपड़े, और फिर सास के साथ निकल गई। रश्मि उनके साथ तो गई, लेकिन उसका मन बच्चों में अटका रहा। शाम को जब दोनों घर आईं, तो घर का हाल देख रश्मि के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। पूरे घर में यहाँ-वहाँ खिलौने और अखबार फैले थे। यह देख सास हल्की सी मुस्कुरा दीं और बेटे ने रश्मि पर शिकायतों की झड़ी लगा दी। रश्मि बिना कुछ बोले जल्दी-जल्दी सामान समेटने लगी। सास किचन से चाय बना लाईं और रश्मि को आवाज़ दी, "रश्मि, चाय पी ले, फिर करना।" यह सुनकर बेटा और भड़क गया और चिढ़कर बोला, "क्या माँ, आप देख नहीं रही हैं, मैं कितना परेशान हो गया हूँ!" सास ने चाय का एक घूँट लिया, कप टेबल पर रखा और बेटे से बहुत प्यार से बोलीं, "बेटा, तुम एक दिन में परेशान हो गए? जिसे रश्मि सालों से बिना किसी शिकायत के कर रही है। आज भी वह सब काम करके गई थी, बस तुम्हें देखना था, जो तुम नहीं कर पाए। उस दिन तो तुम अखबार देखकर खुश हो रहे थे, क्या कभी रश्मि से पूछा कि वह घर के अलावा कुछ करना चाहती है या नहीं?" बेटा चुप हो गया, जैसे उसे अपनी गलती का एहसास हो रहा हो। सास आगे बढ़ीं और रश्मि के पास खड़े होकर बोलीं, "मेरी बहू ने भी M.Com किया है, लेकिन कभी उसने कोई शिकायत नहीं की, अपनी जिम्मेदारी मानी। क्या हो अगर कोई अपनी पहचान बनाना चाहे? जो तुम दूसरों की तारीफ करते हो, क्या कभी रश्मि का हाथ बँटा पाओगे?" यह सुनकर रश्मि की आँखें भर आईं। सास ने रश्मि के कंधे पर हाथ रखा और बड़े प्यार से कहा, "अगर मेरा सपना सिर्फ सीमित न होता, तो आज मैं तुम्हें अपने सपनों को मारने नहीं देती। मुझे माफ़ करना, रश्मि।" एक एहसास रश्मि की कहानी सिर्फ एक घर की नहीं, हर उस महिला की है जो अपनी डिग्री और सपनों को अलमारी में बंद कर चुकी है। याद रखिए, किसी का हाथ बँटाना 'मदद' नहीं, बल्कि 'जिम्मेदारी' है। ☆अनामकारा
"पहरे" यह कहानी किसी घर या किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि उन अनकही भावनाओं का एक आईना है जो अक्सर हम जाने-अनजाने में अनदेखा कर देते है इसका उद्देश्य किसी पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि एक सकारात्मक बदलाव की शुरुआत करना है।" शीतल एक ऐसे परिवार में जन्मी थी जहाँ बेटी से ज्यादा बेटे को मान दिया जाता है। परिवार कुछ रूढ़िवादी सोच के दायरे में सिमटा हुआ था। शीतल का आज 12वीं कक्षा का रिजल्ट आया। वह अच्छे अंकों से पास हुई थी। अपनी ऑनलाइन आई मार्कशीट और चेहरे पर एक सुकून व मेहनत की मुस्कान लिए वह भागती हुई आई और चहकते हुए अपने पिता से बोली, "पापा, मैं पास हो गई!" उसने मार्कशीट पापा की तरफ बढ़ाते हुए कहा, "पापा, अब मुझे भी भाई की तरह बाहर बड़े कॉलेज में पढ़ना है।" पापा उसकी बात पर मुस्कुरा दिए और 'हाँ-हाँ' बोलते हुए उसके अंक देखने लगे। आगे पापा कुछ कहते, उससे पहले ही दादी थोड़ा चिढ़कर और तंज भरे रवैये से बीच में ही बोल पड़ीं, "तुम बाहर पढ़कर क्या करोगी? कौन सा तुमको इस घर में रहना है या हमें तुम्हारी कमाई मिलनी है?" जिस कमरे में अभी हँसी गूँज रही थी, वहाँ सन्नाटा पसर गया। शीतल के चेहरे की मुस्कान एक पल में खत्म हो गई। उसकी मासूम आँखें पापा और मम्मी की तरफ देखने लगीं और वह मन ही मन सोचने लगी कि क्या पापा-मम्मी भी वैसे ही उसकी साइड लेंगे जैसे भाई की लेते हैं? मम्मी, जो पास में ही रोजमर्रा के काम में लगी थीं, वह अपनी बेटी की सफलता पर खुश तो थीं, लेकिन काम में उलझी हुई ही उन्होंने बिना कुछ बोले दादी की बात का समर्थन कर दिया। शीतल अंदर ही अंदर दुखी हो गई और भागकर अपने कमरे में चली गई और खुद को अंदर बंद कर लिया। वह सोचती रही कि कैसे सब भाई की साइड लेते हैं, उसकी नहीं; कैसे उसकी जीत महज बस उसकी होती है और भाई की जीत पूरे परिवार की! यह वह अनछुआ अहसास होता है जो परिवार वाले समझकर भी इस बात से पर्दा डाल देते हैं कि 'बेटी हो'। शीतल पूरे दिन कमरे से बाहर नहीं आई और अपने ही ख्यालों से अकेले लड़ती रही। शाम के वक्त जब सब चाय पी रहे थे, तो पापा ने शीतल को बुलाया। शीतल, जो कुछ वक्त पहले खुश थी, अब उसके चेहरे पर एक गहरी उदासी थी और मन में अनगिनत सवाल। पापा ने शीतल की तरफ चाय का कप बढ़ाते हुए कहा, "शीतल, कॉलेज के लिए देखेंगे, तुम उदास मत हो।" शीतल कुछ कहती, इससे पहले मम्मी ही बोल पड़ीं, "सुनिए जी, हमारे पास अभी एक और इतना बड़ा खर्चा उठाने की गुंजाइश नहीं है और अगले साल इसकी शादी करनी है। अम्मा ठीक कह रही हैं, हम इसको पढ़ने के लिए मना नहीं कर रहे, बस इसी शहर में ही एडमिशन ले ले। हम कौन सा इसके दुश्मन हैं?" मम्मी ने शीतल के सिर पर प्यार से हाथ रखकर कहा, "बेटी, तुम तो समझदार हो।" शीतल का जैसे दिल के साथ भरोसा ही टूट गया। वह अपनी मम्मी की आँखों में देखने लगी और सोचने लगी—क्या मम्मी और दादी को इस बात का अहसास भी है कि वे खुद उस पहरे की पहली सीढ़ी बन रही हैं? जिसे समाज पुरुष-प्रधान कहता है और लोग कहते हैं कि घर के पुरुषों को यह पसंद नहीं है, लेकिन वास्तव में घर की औरतें ही घर की औरतों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए सबसे पहले पहरे लगाती हैं। वह सोचने लगी कि कैसे लोग कहते हैं कि घर के मर्द औरतों पर पहरे लगाते हैं, लेकिन सच तो यह है कि घर की औरतें ही घर की औरतों पर पहरे लगाती हैं—कभी जिम्मेदारी के नाम पर तो कभी रिवायतों के नाम पर। एक एहसास हमें खुद से, अपने घर की औरतों से और समाज से यह पूछना चाहिए कि जाने-अनजाने में कहीं वे किसी और औरत के सपनों पर पहरे तो नहीं लगा रही हैं? ☆अनामकारा
प्रकृति और किसान टूटी उम्मीद और सूना आँगन "हम बारिश का इंतज़ार चाय और सुकून के लिए करते हैं, लेकिन एक किसान के लिए यही बारिश उसके पूरे साल के सपनों की डोर होती है। क्या आपने कभी सोचा है कि जब वही उम्मीद टूटती है, तो एक भरा-पूरा आँगन कैसे सूना हो जाता है? आइए, आज उस किसान के संघर्ष को महसूस करते हैं, जिसकी दुनिया मिट्टी और मौसम के बीच कहीं खो गई।” वैसे तो आज कल लगभग सभी गाँव धीरे-धीरे खाली हो रहे हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा से लगे बुंदेलखंड का हाल एक अलग ही दर्द भरी कहानी कहता है। आषाढ़ (जून-जुलाई) के महीने में जो पहली बारिश होती है, वह तपती धूप और पिघला देने वाली गर्मी से न सिर्फ राहत देती है, बल्कि यहाँ के किसानों के जीवन में एक नई उम्मीद की किरण बन कर आती है। बड़े-बड़े शहरों में बारिश बस गर्मी से आजादी, कहीं अच्छी जगह घूमने या चाय के साथ गरमा-गरम भजिये की वजह बनती है, तो दूसरी तरफ किसानों के लिए उनके जीवन-यापन और सभी छोटे-बड़े सपने सच करने की उम्मीद। कैलाश काका बैठक में बैठे बाहर से आती बारिश की मन को छू लेने वाली आवाज़, साथ ही तेज़ सर-सर की करती हवा जो बैठक की खिड़की से कैलाश काका को छू कर जा रही थी और साथ ही काका के सपनों को उम्मीद दे रही थी। काका के चेहरे की झुर्रियां जैसे खुशमन के आगे कम हो गई थीं और आँखों में पोती की ब्याह और पोते को पढ़ाई के लिए बड़े शहर भेजने के सपने चमक रहे थे। वहीं दूसरी तरफ पहाड़ी इलाके में खनन (mining) के लिए बड़ी-बड़ी क्रशर मशीनें लगाई जा रही थीं। बारिश के थमते ही काका ने खेत में बुवाई शुरू कर दी। कैलाश काका ने बुवाई ही नहीं, खेत की ज़मीन में अपने सपने, मेहनत और एक-एक कर जमा की गई पूंजी भी बीज के साथ खेत में बो दी थी (शायद सभी किसान यही करते हैं)। इस उम्मीद में कि जब फसल कट कर घर के आँगन में आएगी तो न सिर्फ आँगन, बल्कि उनका जीवन भी खुशियों से भर जाएगा। साथ ही कैलाश काका को धीरे-धीरे चिंता सताने लगी थी क्रशर मशीन की खड़-खड़ करती आवाज़ के साथ सफ़ेद उड़ती हुई धूल, जो फसल, पेड़-पौधे, ज़मीन, पानी और साथ में लोगों के स्वास्थ्य पर भी सफ़ेद चादर बन कर बिछ रही थी, जो धीरे-धीरे सब को अपने आगोश में लेकर सब कुछ खत्म करने का काम कर रही थी। देखते ही देखते, क्वार (सितंबर-अक्टूबर) का महीना आ गया। बुंदेलखंड के किसानों और उनकी खरीफ की फसलों के लिए यह महीना किसी सांस रोक देने वाले इम्तिहान जैसा होता है। हर कोई बस यही दुआ करता है कि आसमान साफ़ रहे। लेकिन किस्मत को तो कुछ और ही मंज़ूर था। क्वार की एक काली, भयानक रात अपने साथ बेहिसाब और तेज़ बेमौसम बारिश लेकर आई। उस बारिश के साथ कैलाश काका की फसल ही बर्बाद नहीं हुई, उनका सब कुछ बर्बाद हो गया—उनके सपने, मेहनत और जमा पूंजी भी (अक्सर किसानों के साथ ऐसा ही होता है)। पीछे छोड़ गया तो गिरता हुआ स्वास्थ्य, टूटे सपने और बैंक का कर्ज़ा, जो किसानों के लिए किसी बड़ी समस्या से कम नहीं होता, जिसको चुकाने के लिए किसान जाने क्या-क्या करते हैं। ऐसे ही बैंक के कर्ज़ को चुकाने और रोज़ी-रोटी कमाने के लिए कैलाश काका के परिवार को बड़े शहर जाकर मज़दूरी करने के लिए जाना पड़ा। जिस आँगन में कैलाश काका हरी-भरी फसल रखने, पोती की बारात लाने के सपने देख रहे थे, अब वह आँगन हमेशा के लिए सूना हो गया था। एक एहसास खनन (mining), ये शब्द पढ़ने में बहुत छोटा है लेकिन असल में इसका मतलब बहुत बड़ा है—जो हरे-भरे पेड़-पौधों, जीवन और ज़मीन को बंजर बना देता है। ऐसे ही बेमौसम बारिश, जो किसानों के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं होती। कभी-कभी सोचती हूँ, हमने प्रकृति और किसानों के साथ कितना अन्याय किया है। ☆अनामकारा
अकेलापन.. दीवाली की तैयारी की घर में अलग ही रौनक थी। हर कोई किसी न किसी काम में लगा हुआ था। किचन से आती मिठाई और नमकीन की खुशबू इस दिन को और खास बना रही थी। आँगन में दादी मिट्टी के दीये तैयार कर रही थीं और उनके पास बैठी सिया बत्तियाँ बनाने में व्यस्त थी। तभी किचन से आती बर्तनों की खनक के बीच माँ की आवाज गूंजी, “सिया, इधर आकर मेरी मदद करवा दे।” सिया सिर्फ 15 साल की थी, लेकिन घर में उसे अब बड़ी बेटी की तरह जिम्मेदारियां निभानी थीं। थोड़ी झिझक के साथ जब वह किचन की देहरी पर पहुंची, तो लड्डू बना रही चाची ने हल्का-सा मुस्कुराते हुए कहा, “सिया, अगर खेलना हो गया हो तो सबके लिए चाय बना लो। देखो, वेदु तुमसे छोटी है, फिर भी कैसे हाथ बँटा रही है।” सिया ने उम्मीद भरी नजरों से माँ की तरफ देखा, लेकिन माँ ने कड़ाही से नमकीन निकालते हुए बस इतना कहा, “चाची ठीक कह रही हैं।” यह सुनकर सिया चुपचाप चाय बनाने में लग गई। जब शाम को सब दीवाली की जगमगाहट में डूबे हुए थे, तो सिया छत पर अकेली दूर आती रोशनी को निहार रही थी। शायद वह खुद को ही ढूँढ़ने की कोशिश कर रही थी। वह अक्सर सोचती थी कि आखिर वह ऐसा क्या करे जिससे सबको लगे कि वह भी इस घर का हिस्सा है? क्या घर में सिर्फ लोगों के काम आना और पढ़ाई करना ही पहचान का पैमाना है? वक्त के साथ सिया अपने ही अंदर कहीं खोती चली गई। उसे जब कोई बात चुभती, तो वह चुप हो जाती, और घरवाले उसकी इस खामोशी को उसका घमंड समझ लेते। जबकि वह तो बस यह चाहती थी कि जैसी वह है, सब उसे वैसे ही अपना लें। एक दिन अपनी 12वीं की मार्कशीट हाथ में लेते हुए उसे याद आया कि कैसे उसने सबके दिल में जगह बनाने के लिए दिन-रात मेहनत करके 75% हासिल किए थे। उसे लगा था कि सब खुश होंगे, लेकिन उसी दिन वेदु का 10वीं का रिजल्ट भी आया था। वेदु हमेशा टॉप करती थी और उससे 85% आने की उम्मीद नहीं थी। उसके 85% आने पर घर में सबको इतना दुख हुआ था कि वे यह भी भूल गए थे कि आज सिया का भी रिजल्ट आया है। अपने ख्यालों में डूबी सिया ने खुद से कहा, “चलो सिया, कुछ तुममें ही कमी होगी... या शायद मैं ही पीछे छूट जाती हूँ?” तभी आँगन से माँ की आवाज ने उसे फिर हकीकत में खींच लिया। किचन में काम करते हुए उसने सुना कि चाची और माँ गर्व से वेदु की तारीफ कर रही हैं, और माँ कह रही हैं, “मुझे तो बस सिया की फिक्र होती है, न इसे काम-काज आता है, न पढ़ाई में मन है।” रोटी बनाती सिया के मन में उधेड़बुन चल रही थी कि अगर कोई थोड़ा सा भी उस पर भरोसा कर लेता या प्यार से पूछ लेता कि उसके सपने क्या हैं, तो शायद वह भी कुछ कर पाती। घर की इन घुटन भरी दीवारों के बीच, जब सिया ने बाहर की दुनिया में थोड़ी राहत और अपनापन तलाशना शुरू किया, तो उसकी जिंदगी में राज आया। राज उसकी चुप्पी को कभी घमंड नहीं समझता था, बल्कि प्यार से पूछता— “आज फिर चुप हो?” धीरे-धीरे सिया अपनी छोटी-छोटी बातें, घर के ताने और मन का हर डर राज से कहने लगी। राज उसे समझाता नहीं था, बस उसका साथ देता था। जब राज ने उससे पूछा कि वह आगे क्या करना चाहती है, तो सिया कुछ देर चुप रही, क्योंकि इतने सालों में किसी ने उससे यह सवाल कभी नहीं पूछा था। राज के रूप में उसे वह अपनापन मिल गया जिसकी तलाश उसे बचपन से थी। इसी सहारे के चलते, जब घर में शादी की बात उठी, तो उसने राज का नाम लिया और राज ने भी हामी भर दी। सिया को लगा कि अब उसे रोज-रोज खुद को साबित नहीं करना पड़ेगा। लेकिन वह दिन आया जब सिया सब तैयार होकर राज का इंतजार करती रही। सुबह से शाम ढल गई, पर राज नहीं आया। घर की नजरों में जो सवाल और तंज थे, वे किसी तीर की तरह चुभ रहे थे। रात करीब 11 बजे राज का फोन आया और उसने बेफिक्र अंदाज में कहा कि घर की किसी समस्या के चलते वह आ नहीं पाया। उस एक फोन ने सिया के अंदर वर्षों से जमा हुआ बाँध तोड़ दिया। वह फूट-फूटकर रोई, अपनी जिंदगी के हर उस पल को याद करके रोई जहाँ उसे किसी अपने का साथ चाहिए था, जो उसे कभी नहीं मिला। रोते-रोते जब उसकी आँखें सूख चुकी थीं, तो खिड़की से सूरज की पहली किरण उसके कमरे में दाखिल हुई। उस गुलाबी रोशनी ने सिया के मन को एक ऐसा सुकून दिया जिसकी तलाश उसे उम्रभर थी— अपने अकेलेपन से दोस्ती करने का सुकून, खुद को खुश रखने का सुकून। सिया के चेहरे पर एक नई चमक के साथ हल्की-सी मुस्कान उभरी। वह उठी, अपना मनपसंद जोड़ा पहना और अच्छे से तैयार हुई। उसकी आँखों में अब उदासी नहीं, बल्कि अपने सपनों को जीने की जिद थी। जिंदगी में पहली बार, सिया को किसी और के जरिए अपनी पहचान साबित करने की जरूरत नहीं महसूस हुई; उसे सिर्फ खुद को पहचानना था। ☆अनामकारा
एक अधूरा सफर: खुद को पाने की चाहत में आखिर ऐसा भी क्या पाना था, जिसके लिए मैंने खुद को ही खो दिया? “अक्सर हम सफलता की दौड़ में अपनी पहचान को पीछे छोड़ आते हैं। आज की यह कहानी सिर्फ अर्णव के संघर्ष की नहीं, बल्कि उन अनकहे जज्बातों की है जो हम में से हर कोई कभी न कभी महसूस करता है। आइए ठहर कर अपने उस 'अधूरे सफर' को याद करें जिसे हम दुनिया को तो नहीं दिखा पाते, लेकिन जो हमारी रूह में कहीं दर्ज है।” कमरे में चल रहे पंखे की सर-सर और एसी की ठंडी हवा माहौल को ठंडा तो कर रही थी, लेकिन अर्णव के भीतर मची जलन को जैसे और हवा दे रही थी। बाहर अगस्त की स्याह रात और घुटन भरी उमस बिल्कुल उसके जीवन की दास्तान जैसी लग रही थी। अर्णव कुर्सी से उठा और चुपचाप खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया। एक गहरी सांस लेते हुए, आंखों में बेपनाह दर्द और तकलीफ के बावजूद, उसके चेहरे पर एक फीकी सी मुस्कान उभरी। उसने धीरे से गुनगुनाया, "क्या यह स्याह रात कभी खत्म होगी, या फिर जीवन का हर पन्ना अंधेरा ही रहेगा?" खिड़की बंद कर वह वापस अपनी जगह आ बैठा। उसकी नजर उन किताबों और नोट्स के बंडलों पर थमी, जिन पर शायद अब थोड़ी धूल जमने लगी थी। यह उसकी सालों की मेहनत और तपस्या के अकेले गवाह थे। उसने टेबल पर रखी अपनी मार्कशीट उठाई—वही मार्कशीट जो जैसे चीख-चीख कर कह रही थी कि उसने मेहनत नहीं की। तभी उसकी आंखों से आंसू गिरने लगे। अर्णव का दिल और वह बंद कमरा, दोनों जानते थे कि उसने कितना हौसला दिखाया था। पर दुख तो यह था कि दुनिया के पास उसकी नाकामी का सबूत था, और अर्णव के पास अपनी मेहनत का कोई गवाह नहीं। आखिर जज्बातों का कोई सबूत थोड़ी होता है। तभी फोन की रिंग बजी। कांपते हाथों से उसने फोन उठाया। दूसरी तरफ से उसकी मां की आवाज आई, "बेटा, कैसे हो? खाना खाया?" अर्णव कुछ कहना चाहता था, पर शब्द जैसे गले में ही फंस गए। मां की आवाज में छिपे उस ममता भरे स्पर्श ने जैसे उसके सब्र का बांध तोड़ दिया। दूसरी तरफ, मां अपने बेटे की खामोशी और सुबकियों को सुनकर दिल थामे रह गई। उन्होंने बड़े धैर्य और प्यार से कहा, "बेटा, कोई बात नहीं। हम तुम्हारे साथ हैं। मां हर हाल में अपने बच्चों के साथ खड़ी रहती है।" सच तो यही है, इंसान चाहे कितना भी बड़ा हो जाए, दुख के वक्त सबसे पहले मां ही याद आती है। अर्णव ने आंसू पोंछे और भारी मन से धीरे से पूछा, "मम्मी... पापा क्या कह रहे हैं?" मम्मी की आवाज में थोड़ी हंसी घुली और वह बोली, "पापा कह रहे हैं कि अर्णव को बोलो, कुछ दिन घर आ जाए... अच्छा लगेगा।" अर्णव ने एक भारी सांस ली और हल्के से "हां" कह कर फोन रख दिया। पर उसके मन को तसल्ली नहीं थी। वह गहरी सोच में डूब गया—कैसे एक एग्जाम की तैयारी के लिए उसने अपना घर छोड़ दिया, दोस्तों से दूरी बना ली, और आखिर में उसका वह एक प्यारा रिश्ता भी बेरोजगारी की भेंट चढ़ गया। और अब, इन सबके बीच... उसने शायद खुद को ही खो दिया था। तेज हवा की वजह से खिड़की फिर से खटकी, तो वह अपने खयालों से बाहर आया। उसने एक गहरी सांस ली और खुद से ही पूछा: "आखिर ऐसा क्या पाना था, जिसके लिए मैंने खुद को ही खो दिया?" एक एहसास कभी-कभी हम वक्त की भाग-दौड़ में इतने खो जाते हैं कि रुक कर यह सोचना भूल जाते हैं कि हम असलियत में क्या चाहते हैं। सफलता जरूरी है, मगर क्या अंत में खुद को ही खो देना सही है? आज शायद वक्त है खुद को फिर से ढूंढने का। इस सफर के कुछ पन्ने शायद हम सभी के पास होते हैं—वह अधूरे हिस्से जो हम किसी को दिखा नहीं पाते, पर खुद में महसूस करते हैं। ☆अनामकारा
Copyright © 2026, Matrubharti Technologies Pvt. Ltd. All Rights Reserved | Powered by Custom Web Development Company India.
Copyright © 2026, Matrubharti Technologies Pvt. Ltd. All Rights Reserved.
Please enable javascript on your browser