"मैं से मैं तक"
मैं सोचती हूँ...
आज जो मेरा हिस्सा है
ये धड़कन, ये ज़िद, ये नाम
जिसे लोग मेरा कहकर बुलाते हैं
कल को अगर वो मेरा न रहा,
तो क्या बचूँगी मैं?
क्या मैं बदल जाऊँगी
किसी ऐसी औरत में,
जिसकी आँखों में मेरा अक्स न हो?
या रह जाऊँगी एक खाली खोल,
जिसमें समंदर की आवाज़ तो है,
पर समंदर नहीं?
अगर ढूँढते-ढूँढते,
मैं रास्तों में ही बँट गई,
और हर मोड़ पर
ख़ुद का एक टुकड़ा छोड़ आई...
तो क्या होगा?
क्या मिलूँगी ख़ुद से,
आधी रात को,
जब सारी दुनिया सो जाती है
और सिर्फ़ साँसें जागती हैं?
या पाऊँगी ख़ुद को
उन सवालों के ढेर पर,
जिनके जवाब कभी दिये ही नहीं गए?
डर लगता है...
कि कहीं टूटी हुई मैं,
ख़ुद को जोड़ने की कोशिश में
और ज़्यादा न बिखर जाऊँ।
कि कहीं आईने में देखूँ,
और पूछ बैठूँ
"तुम कौन हो?"
पर फिर कोई कहता है भीतर से
टूटना भी तो बनना है।
बीज अगर टूटे न,
तो पेड़ कैसे बने?
तो अगर मैं खो भी गई,
तो क्या?
मैं अपनी ही राख से,
फिर से जन्म लूँगी।
क्योंकि मैं नदी नहीं,
जो समंदर में मिट जाए
मैं समंदर हूँ,
जो हर लहर में
ख़ुद को नया नाम दे देता है।
और जो मेरा है,
वो मिटता नहीं
बस मौन हो जाता है,
जब तक मैं उसे
फिर से सुनना न सीख लूँ।
प्राची तंवर …..