महाराणा सांगा : मेवाड शिखर पर व खानवा की महान विजय
(1508-1528 ईसवी)
भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पटल पर महाराणा संग्राम सिंह यानी महाराणा सांगा का नाम एक ऐसे अद्वितीय महायोद्धा के रूप में अंकित है, जिनका अदम्य हौसला और राष्ट्रप्रेम उनकी समस्त शारीरिक सीमाओं से कहीं ऊपर था। अपनों के आपसी संघर्ष में अपनी एक आंख खोने और फिर युद्ध की विभीषिका में अपना एक हाथ व एक पैर गंवाने के बाद भी उन्होंने कभी शस्त्र नहीं डाले। उनके क्षत-विक्षत शरीर पर तलवारों और भालों के अस्सी से अधिक गहरे घाव थे, जिसके कारण महान इतिहासकार कर्नल टॉड ने उन्हें ‘सैनिकों का भग्नावशेष’ (खंडहर) कहा था। वे एक ऐसा जीवंत भग्नावशेष थे, जिसके भीतर अखंड भारत को स्वतंत्र देखने की अमर आत्मा निवास करती थी। डॉ. ओमेंद्र रत्नू की सुप्रसिद्ध पुस्तक “महाराणा: सहस्त्र वर्षों का धर्मयुद्ध” के प्रकाश में सांगा जी का जीवन यह सिद्ध करता है कि मेवाड़ का संघर्ष कोई सामान्य सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति को बचाने का एक पवित्र धर्मयुद्ध था। वे मध्यकाल के एकमात्र ऐसे राजा थे, जिनके एक आह्वान पर भारत के समस्त राजा विदेशी आक्रांताओं को खदेड़ने के लिए एक ही भगवा ध्वज के नीचे एकत्र हो गए थे।
दुर्भाग्य से, कुछ वामपंथी इतिहासकारों और विचारकों द्वारा राजनीतिक दुर्भावना के तहत महाराणा सांगा पर बाबर को भारत बुलाने का एक बेहद शर्मनाक और झूठा आरोप लगाया जाता है, लेकिन यह पुस्तक अकाट्य प्रमाणों के साथ इस मनगढ़ंत नैरेटिव की धज्जियां उड़ाती है। इस मनगढ़ंत आरोप का एकमात्र आधार ‘बाबरनामा’ में बाबर का एकतरफा और स्वार्थी बयान है, जिसका कोई अन्य समकालीन ऐतिहासिक प्रमाण दुनिया के किसी कोने में नहीं मिलता। सत्य तो यह है कि महाराणा सांगा उस समय संपूर्ण भारत के सबसे शक्तिशाली शासक थे, जिन्होंने दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी को खतौली और धौलपुर के युद्धों में अकेले अपने दम पर धूल चटाई थी। जो योद्धा दिल्ली सल्तनत को खुद कई बार परास्त कर चुका हो, उसे काबुल के एक साधारण लुटेरे को बुलाने की भला क्या आवश्यकता थी? ऐतिहासिक रूप से यह पूरी तरह प्रमाणित है कि बाबर को पंजाब के सूबेदार दौलत खान लोदी और इब्राहिम लोदी के सगे चाचा आलम खान लोदी ने अपनी व्यक्तिगत दुश्मनी निकालने के लिए भारत आमंत्रित किया था। खानवा के युद्ध में महाराणा सांगा के भीषण पराक्रम से बाबर के सैनिक इस कदर थर-थर कांप उठे थे कि वे युद्ध छोड़कर भागने की भीख मांग रहे थे, जिसके बाद मजबूर होकर बाबर को अपने सैनिकों को रोकने के लिए उस युद्ध को ‘जिहाद’ यानी मजहबी जंग घोषित करना पड़ा था। क्या कोई देशद्रोही राजा विदेशी आक्रांता के खिलाफ पूरे देश को एकजुट करके सनातन धर्म की रक्षा के लिए युद्धभूमि में अपना सर्वस्व न्योछावर करता? महाराणा सांगा देशद्रोही नहीं बल्कि भारतीय अस्मिता के वह अमर गौरव हैं जिन्होंने सिखाया कि पराजय शरीर की नहीं, केवल मन की होती है और यह गाथा हर देशवासी के भीतर छिपे राष्ट्रप्रेम और स्वाभिमान को जगाने के लिए काफी है।
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