मशवरा है कि अब खामोश ही रहा जाए,
दिलों के राज़ दिलों में ही दफ़्न रहने दो,
ये वो गिरह है जिसे हम अब खोल नहीं सकते।
सच हम बता नहीं सकते, झूठ बोल नहीं सकते।
सलामत रहे भ्रम ये जो ज़माने में है,
मजबूरी है हमारी कि सच जता नहीं सकते।
नफ़रत बढ़ेगी या फिर टूटेंगे कई रिश्ते,
तराज़ू में जज़्बात हम तोल नहीं सकते।
सच हम बता नहीं सकते, झूठ बोल नहीं सकते।
नज़रों से जो पढ़ सको तो पढ़ लो दास्ताँ,
ज़ुबाँ से तो कोई लफ़्ज़ हम बोल नहीं सकते।
ईमान गवाही देता नहीं झूठी बयानी की,
और सच से किसी का सुकूँ रोल नहीं सकते।
सच हम बता नहीं सकते, झूठ बोल नहीं सकते।
'ख़ामोशी' को ही बना लिया है अब हमसफ़र,
कि जज़्बात हवाओं में हम घोल नहीं सकते।
है अजीब कशमकश इस मोड़ पर ज़िंदगी की,
कदम आगे या पीछे हम डोल नहीं सकते।
सच हम बता नहीं सकते, झूठ बोल नहीं सकते।