Hindi Quote in Poem by Sudhir Srivastava

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रोला छंद
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श्रम साधक मजदूर, रात दिन मेहनत करता।
कब कहता मजबूर, रोज रोटी को खटता।।
कहें मित्र यमराज, यही है इनका सावन।
नहीं मानते हार, भाव रखते मन पावन।।७३

कैसा इनका हाल, आप हम सब ही जानें।
बात अलग है और, नहीं सरकारें मानें।।
कहें मित्र यमराज, नहीं अब और रुलाओ।
श्रम साधक मजदूर, मान-सम्मान बढ़ाओ।।७४

अपनों का अब प्यार, आज कोई ना चाहे।
बेईमानी की ओट, रोज ले बढ़ते राहें।।
कहें मित्र यमराज, गजब है लीला न्यारी।
अपने होते दूर, यही है माया भारी।।७५

सहता है आरोप, बड़ा जो बेटा घर का।
उसे नहीं है ज्ञान, भाग्य फल कैसा उसका।।
यह कैसा है दस्तूर, हमें भी आप बताओ।
क्या मेरा अपराध, बड़े होना समझाओ।।७६

करते रहें प्रयास, हार को पीछे छोड़ो।
पूरी होगी आस, जीत से रिश्ता जोड़ो।।
कहें मित्र यमराज, दूर होंगी बाधाएँ।
सदा जगाए ज्योति, आप रखना आशाएँ।।७७

हीन भावना छोड़,स्वाद गौरव का चखना।
सारे बंधन तोड़, जगाए आशा रखना।।
कहें मित्र यमराज, पूर्ण होगी सब आशा।
नहीं मानना हार, मिटेगी आप निराशा।।७८

होती है अनमोल, सभी के माँ की ममता।
जिसे रहे हम तोल, कहाँ है कोई समता।
कहें मित्र यमराज, मात सब है पर भारी।
बाँट रहे क्यों ज्ञान, धरा सम है महतारी।।७९

करते रहिए दान, बिना कुछ शोर मचाए।
दृष्टा रखिए भाव, ईश में भाव समाए।।
ईश्वर का आभार, मिला है अवसर मानो।
ये तो है सौभाग्य, लेख अपना पहचानो।।८०

दान धर्म का आप, व्यर्थ क्यों गाते गाना।
कम ज्यादा का गीत, कभी मत करो बखाना।।
कहें मित्र यमराज, बड़ी है इसकी महिमा।
करिए अपना काम, सदा रख दानी गरिमा।।८१

गुरुवर पर विश्वास, ज्ञान भी तब पाओगे।
वरना खाली हाथ, हमेशा रह जाओगे।
कहें मित्र यमराज, कौन कह सकता कमतर।
जिसके सिर पर हाथ, सदा रखते हों गुरुवर।।८२

वन उपवन बस नाम, आज है केवल बाकी।
सपने होते चूर, कहें अब नानी काकी।।
कहें मित्र यमराज, देख लो कलयुग माया।
है विकास की होड़, रोज ही सिमटे छाया।।८३

कर देंगे गुमराह, सदा बच के सब रहना।
कहें मित्र यमराज, मानिए मेरा कहना।।
सब कहते अभिशाप, आज की है लाचारी।
यह कैसा संताप, पड़े नित सब पर भारी।।८४

नेता जी का हाल, आज देखे सब जनता।
रोती माथा पीट, काम कोई ना बनता।
कहें मित्र यमराज, प्रभो कुछ तो अब कीजै।।
कैसा है यह राज, राह जनमानस दीजै।।८५

कब आओगे नाथ, आप हमको बतलाओ।
या फिर कर दो फोन, राग भैरवी सुनाओ।।
कहें मित्र यमराज, आप जो अच्छा लगता।
दिक्कत की जो बात, आपको इतना छजता।।८६

मौन और मुस्कान, भाव इनका है व्यापक।
समझ गये यदि आप, मिटे हर कोई चकचक।।
कहें मित्र यमराज, नहीं लगता है पैसा।
सुख देता है आप, भाव हो जिसका जैसा।।८७

अपने मन की मैं व्यथा, नहीं कहूँगा मित्र।
व्यर्थ खींचना क्यों भला, आप बताओ चित्र।।
कहें मित्र यमराज, रहो संभाले बोझा।
नहीं नचाना आप, मानकर बड़का ओझा।।८८

जिसका झुका न माथ, वही पड़ता कब भारी।
कलयुग का है दौर, बेवजह की बीमारी।।
कहें मित्र यमराज, समय अब नहीं पुराना।
जिसे सुने हम आप, गया वो दूर जमाना।।८९

जन्म दिवस पर आज, हम सब का मन हर्षाया।
खुशियों की सौगात, संग में अपने लाया।।
कहें मित्र यमराज, सदा ही तू खुश रहना।
इतनी सी है चाह, रहो बन सुंदर गहना।।९०

जागी है उम्मीद, आज चहुँदिश जो दिखता।
बढ़ता जाता आज, सनातन धर्म जागता।।
कहें मित्र यमराज, नहीं पीछे अब जाना।
राष्ट्र-धर्म का नित्य, जागरण आप जगाना।।९१

आज हमें परमार्थ, व्यर्थ है केवल लगता।
लेकर इसकी आड़, हमें हर कोई ठगता।।
कहें मित्र यमराज, आज परमारथ भारी।
सच कहते हैं लोग, बनी अब ये बीमारी।।९२

यह कैसा संसार, जहाँ अब स्वारथ भारी।
रिश्ता नाता भूल, हुए सब मतलब धारी।।
कहें मित्र यमराज, यही कलयुग की माया।
किसे कहें हम आज, कौन है अपना भाया।।९३

बढ़ता जाता ताप, देखती दुनिया सारी।
दोषी भी हम आप, खूब करते तैयारी।।
बेतरतीब विकास, महज है इसका दोषी।
जिसका करते आज, सभी जन पाला-पोषी।।९४

बरस रही है आग, सभी सुरक्षित रहिए।
सोच समझकर आप, चलाएँ जीवन पहिए।।
कहें मित्र यमराज, काम की है मजबूरी।
बस इतना अनुरोध, रखो थोड़ी सी दूरी।।९५

चाहे बरसे आग, बेबसी भी तो भारी।
भूखा है परिवार, व्यर्थ आगे लाचारी।।
कहें मित्र यमराज, द्वंद हो चाहे जितना।
जो भी हैं मजबूर, भूख की चक्की पिसना।।९६

करो नहीं तकरार, भूख है सबसे आगे।
बरस रही है आग, कहाँ तक कोई भागे।।
कहें मित्र यमराज, दोष सब है मानव का।
लालच महज विकास, कहो मत इनका उनका।।९७

रखकर जो भी धैर्य, सदा ही आगे बढ़ते।
नहीं छोड़ते आस, हार से कभी न डरते।।
कहें मित्र यमराज, राह जो नहीं भटकते।
पाते वही मुकाम, जीत की जिद जो करते।।९८

संतों के सदज्ञान, सदा ही पावन होते।
भेदभाव से दूर, बीज सदगुण के बोते।।
कहें मित्र यमराज, सीख लो इतना प्यारे।
जन-मन का कल्याण, भाव हों सदा तुम्हारे।।९९

मानवता का पाठ, सीखिए संत जनों से।
देना आदर भाव, जान भी लेना इनसे।।
कहें मित्र यमराज, नहीं मन संत दुखाना।
रहो दंभ से दूर, पड़े क्यों कल पछताना।।१००


सुधीर श्रीवास्त

Hindi Poem by Sudhir Srivastava : 112025407
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