ग़ज़ल जो अब तक लिखी मैंने, वो सब बिन-बहर है,
कुछ ख़ास नहीं पास मेरे, फ़क़त लफ़्ज़ों का असर है।
मेरी हर इक तहरीर में निहाँ हैं रम्ज़ कई गहरे से,
दर्द-ओ-ग़म जो मैं जीती रही हूँ, बस वही मेरा शजर है।
'कीर्ति' अभी राह-ए-सुख़न में है इक तन्हा मुसाफ़िर,
बस टूटे अल्फाज़ो को जोड़ने वाली, अदना सी सुख़नवर है।