हे प्रभु
कैसी है ये दुनिया बनाई
मुझे तो समझ ना आई
क्या सही क्या बुरा
सब कुछ तुमने ही रचाया
एक बीज से कैसे पौधा बनता
इंद्रधनुष आकाश में कैसे बनता
कहीं धरती मिलती आकाश से
कहीं नदियां मिलती समन्दर से
कहीं ऊँची-ऊँची इमारतें
कहीं टेढ़े-मेढ़े रास्ते
जितना मैं सोचूं, उतना ही उलझूं
कैसी ये रीत, कैसी परम्परा
अंत में सब राख हो जाना है
यही रह जायेगी सब माया
साथ नहीं कुछ जाना है
जीवन है क्षणिक बुलबुला जल का
कब फूट जाय किसने जाना है
पांच तत्व जल, भू, अग्नि, वायु, आकाश
प्राण है कहाँ, कहाँ चले जायेंगे
तेरा-मेरा, जीवन का सब फेरा
आए कितने और कितने सिकन्दर जायेंगे
ये दुनिया एक छलावा है
जान ले खुद को समय से पहले
आयेगा तेरा भी कल बुलावा है
न आदि है न अंत है
सब शून्य है, शून्य में ही यही सृष्टि है
एक चक्र है ये जीवन, दर्शन उसकी दृष्टि है
मैं कौन हूँ क्या है मेरा ध्येय
ले लो शरण मुझे अब अपनी
नहीं समझना मुझे कुछ भी,
शेष न रहे अब कुछ ज्ञान
तेरे दर्शन की प्यास है
अब तेरी ही आस है
परब्रह्म परमेश्वर तू मेरा विश्वास है
हे प्रभु आपको वंदन बारम्बार है।
।। जय महाकाल ।।
डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi