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Nitya Oswal

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@nityaoswal430745

मानव धर्म ?
दादा भगवान की दृष्टि में मानव धर्म कोई औपचारिक कर्मकांड नहीं बल्कि जीवन जीने की एक सहज और वैज्ञानिक कला है। इस धर्म का मूल आधार यह बोध है कि प्रत्येक जीवित प्राणी के भीतर वही शुद्ध आत्मा विराजमान है जो हमारे भीतर है, और इसी एकता के कारण किसी भी जीव को दुःख पहुँचाना वास्तव में स्वयं को ही दुःख पहुँचाने के समान है। दादाजी समझाते हैं कि मनुष्य जीवन एक महत्वपूर्ण पड़ाव है जहाँ से हमारे भविष्य की गति निर्धारित होती है। यदि हम अपने मन, वचन और काया का उपयोग दूसरों को सुख देने के लिए करते हैं, तो हमारे जीवन में सुख और शांति का स्वतः आगमन होता है, लेकिन यदि हमारे व्यवहार से किसी को ठेस पहुँचती है, तो वह अंततः हमारे ही दुखों का कारण बनता है।

दादा भगवान समझाते हैं कि मनुष्य का शरीर एक ऐसा माध्यम है जहाँ से हम तय करते हैं कि आगे का सफर कैसा होगा। वे इसे 'डेवलपमेंट' की एक सीढ़ी मानते हैं। उनके अनुसार, पशु और मनुष्य में मूल अंतर केवल आहार, भय और निद्रा का नहीं है, बल्कि 'विवेक' का है। यह विवेक ही हमें बताता है कि जिस तरह हमें कांटा चुभने पर दर्द होता है, ठीक वैसा ही दर्द दूसरे को भी होता है। जब एक इंसान इस दर्द को महसूस करने लगता है, तब उसके भीतर सही मायने में मानवता का जन्म होता है। मानवता का सबसे सरल पैमाना यह है कि हमें अपने भीतर झाँककर देखना चाहिए कि हमें दूसरों का कैसा व्यवहार पसंद आता है; जो व्यवहार हमें अपने लिए अच्छा नहीं लगता, उसे दूसरों पर लागू न करना ही सबसे बड़ी नैतिकता है। दादा भगवान का 'अक्रम विज्ञान' कहता है कि सच्चा धर्म मंदिर या मूर्तियों में नहीं बल्कि हमारे आपसी व्यवहार की शुद्धता में है। जब हम निस्वार्थ भाव से दूसरों की सेवा करते हैं और अपनी शक्ति का उपयोग परोपकार में लगाते हैं, तब हमारे भीतर से अहंकार कम होने लगता है और हम आत्म-साक्षात्कार के करीब पहुँचते हैं। वास्तव में, मानव धर्म वह नींव है जिस पर आध्यात्मिक मुक्ति का महल खड़ा होता है। बिना एक अच्छा इंसान बने, ईश्वर की प्राप्ति संभव नहीं है। इसलिए, हर परिस्थिति में दूसरों के साथ न्यायपूर्ण और करुणामयी व्यवहार करना ही उस परम तत्व की सच्ची भक्ति है जिसे दादा भगवान ने पूरी दुनिया को सिखाया है।
https://youtu.be/pXW0_ic5npI?si=xoekcDB-3GtCxv50

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संसार में इतना दुःख और पीड़ा क्यों है?
दुःख सब नासमझी का ही है इस जगत् में। दूसरा कोई भी दुःख है, वह सब नासमझी का ही है। खुद ने खड़ा किया हुआ है सब, नहीं दिखने के कारण! जले तब कहें न, कि भाई! कैसे आप जल गए? तब कहता है, 'भूल से जल गया, कोई जान-बूझकर जलूँगा?' ऐसे ये सारे दुःख भूल से हैं। सब दुःख अपनी भूल का परिणाम है। भूल चली जाएगी तो हो गया।

प्रश्नकर्ता : कर्म चिकने होते हैं, उसके कारण हमें दुःख भुगतना पड़ता है?

दादाश्री : अपने ही कर्म किए हुए हैं, अपनी ही भूल है। किसी अन्य का दोष इस जगत् में है ही नहीं। दूसरे तो निमित्त मात्र हैं। दुःख आपका है और सामने वाले निमित्त के हाथों दिया जाता है। ससुर की मृत्यु का पत्र पोस्टमेन दे जाए, उसमें पोस्टमेन का क्या दोष?
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A. M. Patel se Dada Bhagwan | अंबालाल पटेल से दादा भगवान | Journey of Dada Bhagwan |Theme Park

जीवन, हम सभी के लिए एक यात्रा है, जिसमें हमें बहुत सारे उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ता है। विपरीत परिस्थितियों में हम दुखी हो जाते हैं क्योंकि हम उसके वास्तविक कारणों को नहीं जानते हैं। इस वीडियो द्वारा हमें परम पूज्य दादा भगवान की अलौकिक द्रष्टि का भी परिचय होगा जिससे उन्होंने अपने जीवन की हर परिस्थिति का विश्लेषण करके उसके पीछे के वास्तविक कारणों को जाना। उनकी इस अलौकिक द्रष्टि द्वारा वे न केवल अपने आसपास होनेवाली घटनाओं को बेहतर ढंग से समझ सके लेकिन इससे वे आध्यात्मिक मार्ग में भी आगे बढ़ सके। परम पूज्य दादा भगवान और उनके आस-पास की हर चीज के प्रति उनके अलौकिक दृष्टिकोण के बारे में अधिक जानने के लिए इस वीडियो को देखें।

https://youtu.be/8SRzvkEqGe0?si=uAqG42fMMEK0r5KB

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किसी के मेहनत से कमाए हुए पैसे क्यों चोरी हो जाते हैं?

तब लोग मुझे पूछते हैं कि ये चोर और जेबकतरे क्या करने आए होंगे? भगवान ने क्यों इन्हें जन्म दिया होगा? अरे, वे नहीं होते तो तुम्हारी जेबें कौन खाली करेगा? भगवान क्या खुद आएँगे? तुम्हारा चोरी का धन कौन पकड़ेगा? तुम्हारा काला धन होगा तो कौन ले जाएगा? वे बिचारे तो निमित्त हैं। अतः इन सभी की आवश्यकता है।

प्रश्नकर्ता : किसी की पसीने की कमाई भी चली जाती है।

दादाश्री : वह तो इस जन्म की पसीने की कमाई है, लेकिन पहले का सारा हिसाब है न! बही खाता बाकी है इसलिए वर्ना कोई कभी हमारा कुछ भी नहीं ले सकता। किसी से ले सके, ऐसी शक्ति ही नहीं है। और ले लेना वह तो हमारा कुछ अगला-पिछला हिसाब है। इस दुनिया में कोई पैदा नहीं हुआ कि जो किसी का कुछ कर सके। इतना नियमवाला जगत् है। बहुत नियमवाला जगत् है। यह पूरा मैदान साँपों से भरा हो, लेकिन साँप हमें छू नहीं सकता, इतना नियमवाला जगत् है। बहुत हिसाबवाला जगत् है। यह जगत् बहुत सुंदर है, न्याय स्वरूप है लेकिन लोगों की समझ में नहीं आता।

संदर्भ:
Book Name: हुआ सो न्याय (Page # 5 Last Paragraph , Page #6 Paragraph #1 ,#2,#3)

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कर्ता कौन?
कई बार ऐसा भी होता है जब ऐसा लगता है कि सब कुछ गलत हो रहा है और हमें इसके पीछे का कारण भी नहीं पता होता। ऐसे मामलों में, हम कभी-कभी या तो लोगों, परिस्थितियों या यहां तक कि भगवान को भी दोषी ठहरा देते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि सर्वोत्तम परिणाम के लिए सभी उपाय करने के बावजूद चीजें गलत क्यों हो जाती हैं? इसके पीछे का विज्ञान क्या है? हमारे आस-पास जो कुछ भी हो रहा है उसके पीछे कौन है, इसके बारे में और अधिक जानने के लिए यह दिलचस्प वीडियो देखें।

https://youtu.be/r6cHwRKjtMY?si=kfs2WTuKDCItim3g

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दुनिया देखने का सीधा चश्मा।

जीवन में अक्सर ऐसी कुछ कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है जब चीजें हमारी इच्छा के अनुसार नहीं होती हैं, जिससे हम आसानी से तनावग्रस्त, निराश, परेशान हो जाते हैं और लोगों या स्थितियों को दोष देते हैं। हमारे आस-पास जो कुछ भी घटित होता है वह कई चीज़ों के एक साथ आने का परिणाम है और हम उनमें उलझ जाते हैं क्योंकि हम नहीं जानते कि इसके पीछे असली कर्ता कौन है। आइए इस वीडियो को देखें और जानें कि क्या होता है जब अदालत को जेबकतरे के मामले में उस घटना के असली कर्ता का फैसला करना होता है।

https://youtu.be/4qN2VK9_bEc?si=sV-kLbU3U_PM3m2r

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सबका टाइम आयेगा- New Short Film in Hindi 2019 | Dada Bhagwan Foundation Presents

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