शीर्षक -"विदाई"
फूलों की महक मिल रही, उम्र धीरे-धीरे गुजर रही,
वह पुराना समय अब कहाँ से आएगा?
हम थे बागों की चहल-पहल, मगर वो पुराने बाग कहाँ से आएंगे?
चिड़ियों की आवाज़ में हम मगन थे, मगर वो चिड़िया अब कहाँ से आएगी?
कुछ फूलों से मिले, कुछ फूलों से दूर हो गए,
मगर वह पुराना समय अब कहाँ पर आएगा?
अब सुनो मेरी इन नन्हीं कलियों,
हम तो बागों में रहने वाले फूल थे,
अब हम खिल गए हैं, इसलिए बागों में जगह कहाँ?
दस्तूर है हर बाग का, खिल कर महकना पड़ता बागों के आँगन में,
न महको तो फिर तुम फूल कहाँ?
सुनिए मेरे बागों के माली,
हम आपको कोटि-कोटि करते हैं प्रणाम,
आपने ही सींचा है हमें अपनी ममता से,
अब महक कर दुनिया में रोशन करेंगे आपका नाम।
कुछ हसीन शब्दों से
कुछ सुनहरे रंगों से आपका
किताबों के हऱ पन्नों में लिख दूँगा नाम
कलम नहीं मेरी जादू है
मगर दिया हुआ तों आप लोगो वरदान हैं
-सत्येंद्र कुमार "एसटीडी "✍️
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