जाना
ये जो बारिश है ना
कभी फ़र्क नहीं करती
जब गिरती है अब्र की ख़्वाहिश ले कर
मट्टी पत्थर सब्ज़-ओ-बंजर
बे-फ़र्क भीगोती है सबको
भरके अपनी गीली बाहों में
ये जो बारिश है ना
पुर-कैफ़ फूल सोचता है
बस उसको ही छूने गिरी है बारिश
फूल की ये मिथ्या
बारिश की बेवफाई तो नहीं
बस ऐसी ही बारिशों सी फितरत तुम्हारे इश्क़ की
और वैसी ही फूलों सी ग़लत-फ़हमी मेरी
बारिश जब ठहर जाती है
तो फूलों की ओक में
रह जाती है मुट्ठीभर झील बनके
वैसे ही जैसे तुम ठहरी हो
मेरे वक़्त की ओक में
जाना....
एक बार फिर....
-विवेक वोरा