जगत से हमें जो पहचान मिलती है, जीवनपर्यंत हम उसी को सत्य समझने लगते हैं। यदि अपनी वास्तविकता की कहीं थोड़ी से झलकी मिल भी जाये, तब भी जगत में अधिक समय बिताने पर सब जस का तस हो जाता है। मेरे लिए यह न निगलने और न उगलने जैसी स्थिति बन गई है, न इस पार का रहा और न ही उस पार का। 😏