एक ख़ालीपन-सा था कभी इस सफ़र में,
तुम मिले तो रौशनी उतर गई नज़र में।
वक़्त ने भी कैसी-कैसी चालें चल दीं,
अपने ही खड़े मिले हमारे विरुद्ध शहर में।
कल तक जो मेरी ख़ामोशियों को पढ़ते थे,
आज वही मशगूल हैं मेरी ख़बर में।
तोहमतों की धूल उड़ाकर चले गए लोग,
सच मगर अब भी साँस ले रहा है असर में।
हमने मोहब्बत को कभी सौदा नहीं समझा,
दिल ही रखा हर रिश्ते की रहगुज़र में।
अब न शिकायत है, न किसी से गिला कोई,
जो बचा है, वही काफ़ी है इस सफ़र में।
अगर गिरा भी हूँ, तो फिर सँभलकर उठूँगा,
हौसला अभी ज़िंदा है मेरे जिगर में।
✍️ — बेनी सागर