मैं और मेरे अह्सास
शोर
खामोशी भीतर बहुत शोर मचाती हैं l
अंदर से झिंझोड़कर वो हिलाती हैं ll
दर्द में डूबे हुए दिलों दिमाग को l
नशीली यादों का जाम पिलाती हैं ll
तन्हाई में जब अकेले हो तब तो l
पुरानी गलीयों से फ़िर मिलाती हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह