विज्ञान को धर्म के विरुद्ध खड़ा करना उतना ही अधूरा दृष्टिकोण है, जितना धर्म को विज्ञान का विरोधी मान लेना। विज्ञान का काम है प्रकृति के नियमों को समझना, प्रश्न पूछना और प्रमाणों के आधार पर सत्य की खोज करना, जबकि आस्था मनुष्य के भीतर अस्तित्व, चेतना और जीवन के अर्थ से जुड़े प्रश्नों को संबोधित करती है। इतिहास में अनेक महान वैज्ञानिक ईश्वर में विश्वास रखते थे और आस्तिक थे। विज्ञान किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान से नहीं, बल्कि उसके शोध, प्रमाण और खोज से आगे बढ़ता है।
आस्तिक होने का अर्थ यह नहीं कि हम विज्ञान को नकारते हैं, बल्कि हमारे लिए विज्ञान भी उसी सृष्टि को समझने का एक माध्यम है, जिसे हम ईश्वर की रचना मानते हैं। विज्ञान ने संसार के रहस्यों को समझने में जितना योगदान दिया है, उसका सम्मान होना चाहिए, लेकिन विज्ञान की उपलब्धियों को आधार बनाकर धर्म, ईश्वर और आध्यात्मिकता को पाखंड कह देना भी उचित नहीं। वैज्ञानिक खोज और ईश्वर में आस्था एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि सत्य की खोज के दो अलग-अलग मार्ग हैं।
इसलिए किसी को केवल इसलिए अंधविश्वासी या पाखंडी कहना कि वह ईश्वर में विश्वास करता है, उतना ही अनुचित है जितना किसी नास्तिक का मजाक उड़ाना। हमारी आस्था हमें विज्ञान से दूर नहीं करती; बल्कि हमें यह विश्वास देती है कि इस विशाल और रहस्यमय सृष्टि के पीछे कोई गहरी व्यवस्था और चेतना अवश्य है।