मेरे कमरे की खिड़की पर
हर शाम धूप थोड़ी देर ठहरती है,
जैसे उसे भी मालूम हो—
दिन ढलने के बाद
यहाँ कोई बात पूरी नहीं होती।
टेबल पर रखी किताब
हर रात उसी पन्ने पर खुलती है,
शायद उसे भी पसंद है
वो जगह
जहाँ कहानी ने मुड़ना छोड़ा था।
मैंने कई बार
पुरानी चुप्पियों को समेटकर
एक नया दिन बनाना चाहा,
मगर चुप्पियाँ भी अजीब थीं—
हर बार
किसी भूली हुई आवाज़ का
एक टुकड़ा छोड़ जाती थीं।
अब मैं उनसे लड़ती नहीं,
बस सुनती हूँ…
क्योंकि कुछ आवाज़ें
जवाब माँगने नहीं आतीं,
वो सिर्फ़ यह याद दिलाने आती हैं
कि हम कभी
इतने खामोश भी नहीं थे।
~sheetal