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तुम्हारा ख़त तुम्हारा ख़त मिला, तो लगा जैसे बीता हुआ कल फिर से दरवाज़े पर खड़ा है। कुछ शब्द धुंधले थे, कुछ अधूरे, मगर हर पंक्ति में तुम साफ़ दिखाई दिए। ख़त छोटा था, पर देर तक पढ़ती रही… शायद इसलिए नहीं कि उसमें बहुत कुछ लिखा था, बल्कि इसलिए कि जो नहीं लिखा था, वो सब समझ आ गया। ~sheetal
अनकही बातें तुमसे कहने को बहुत कुछ था, मगर हर बार शब्दों से पहले खामोशी आ गई। अब तुम पास नहीं, फिर भी अजीब है— मेरी सबसे ज़्यादा बातें आज भी तुमसे ही होती हैं। ~sheetal
पुरानी अलमारी के एक बंद खाने में आज भी कुछ ख़त रखे हैं, जिन्हें पढ़ने की हिम्मत नहीं, और फेंकने का मन नहीं। अजीब है न— कुछ चीज़ें पुरानी होकर भी हमसे ज़्यादा ज़िंदा रहती हैं। ~sheetal 🙏
मेरे कमरे की खिड़की पर हर शाम धूप थोड़ी देर ठहरती है, जैसे उसे भी मालूम हो— दिन ढलने के बाद यहाँ कोई बात पूरी नहीं होती। टेबल पर रखी किताब हर रात उसी पन्ने पर खुलती है, शायद उसे भी पसंद है वो जगह जहाँ कहानी ने मुड़ना छोड़ा था। मैंने कई बार पुरानी चुप्पियों को समेटकर एक नया दिन बनाना चाहा, मगर चुप्पियाँ भी अजीब थीं— हर बार किसी भूली हुई आवाज़ का एक टुकड़ा छोड़ जाती थीं। अब मैं उनसे लड़ती नहीं, बस सुनती हूँ… क्योंकि कुछ आवाज़ें जवाब माँगने नहीं आतीं, वो सिर्फ़ यह याद दिलाने आती हैं कि हम कभी इतने खामोश भी नहीं थे। ~sheetal
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