रोला छंद
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बाहर निकलो आप, कहाँ हो फंसे अतीत।
तुमको तो है ज्ञान, व्यर्थ है इससे प्रीत।।
कहें मित्र यमराज, बहुत है दुख ये देता।
नहीं समय के साथ, मनुज जो खुद से चेता।।१५१
मन की आँखें खोल, हमें है आगे बढ़ना।
करक सोच विचार, स्वप्न अपने तुम गढ़ना।।
कहें मित्र यमराज, सीख हमसे यह सीखो।
ऐसा क्यों हो आप, व्यर्थ तुम कल में चीखो।।१५२
दीप चंद्र में वृक्ष, नवल अंकुर की आशा।
सीढ़ी चढ़ती सोच, पंथ नूतना प्रकाशा।।
किरणों में ही सदा, पले जीवन अवतारा।
उर्वर मन की भूमि, बीज अंकुरण सहारा।।१५३
बदली जब छाने लगी, वर्षा की तब आस।
सावन भी सूखा रहे, फिसल रहा विश्वास।।
फिसल रहा विश्वास, लगे चोट की गुगली।
देख रहा किसान, बड़ी उम्मीद से बदली।।१५४
बेंच दिया ईमान, बड़ी चिंता है तुमको।
क्या इतना अधिकार, नहीं अब दोगे मुझको।।
कहें मित्र यमराज, करो तुमको जो करना।
डरे नहीं हम राम, आज फिर किससे डरना।।१५५
छाई छटा के साथ, द्वार सावन है आया।
हरित धरा श्रृंगार, देखकर मन मुस्काया।
बूंदों की है तान, खुशी से मोर नाचते।
पीड़ा हर ली राम, प्राणि जन-मन हर्षाते ।।१५६
कहते हैं कुछ लोग, दीन की किस्मत फूटी।
कैसा है संयोग, ईश की करुणा रुठी।।
करते सभी विचार, रहा क्यों होता ऐसे।
सबका अपना भाग्य, मिला है जिसको जैसे।।१५७
हरियाली के साथ, आज वर्षा ऋतु आई ।
भीगी धरती आज, सभी मुख खुशियाँ छाई।।
नभ में गरजे मेघ, हुए सब जन-मन गदगद।
पावस जैसा साज, मिटाता सारे सरहद॥१५८
मूरख जैसी चाल, समय की देखी माया।
बदले नहीं विचार, मनुज की झूठी काया।।
सच है सारा झूठ, व्यर्थ मत करो लड़ाई।
स्वार्थ सिद्धि के हेतु, हमारी करो बड़ाई।।१५९
चलो साधना पाथ, समर्पण मन हो भाया।
तभी जलेगा दीप, भाव आस्था की छाया।।
कहें मित्र यमराज, भावना होगी जैसी।
वरना सब बेकार, ईश लीला भी वैसी।।१६०
मिला पिया का साथ, हुई जब ईश्वर इच्छा।
नहीं किया था रार, समय की मान परीक्षा।।
कहें मित्र यमराज, सृष्टि कीअद्भुत माया।
मातृ शक्ति है नारि, अनोखी इसकी काया।।१६१
होता कितना आज, भला परिजन का संगम।
कहते ज्ञानी संत, मनुज हो रहे नराधम।।
कहें मित्र यमराज, ठने कोई आयोजन।
या फिर होती मृत्यु, मिलें तब अपने बेमन।।१६२
कविगण संगम खूब, आड़ पैसे के होता।
निंदा करते लोग, प्रेम से खाते गोता।।
कहें मित्र यमराज, सभी की है मजबूरी।
नहीं किसी को लाभ, अगर रखते हैं दूरी।।१६३
सभी यहाँ मेहमान, जानते सब हैं इतना।
पर समझें कब लोग, मूर्ख बन रहते कितना।।
कहें मित्र यमराज, खेल चाहे जो खेलो।
अगर नहीं है ज्ञान, मुफ्त में मुझसे ले लो।।१६४
क्या इतना लाचार, आज के हम सब मानव।
नोचें बेटी जिस्म, देख शर्माते दानव।।
कहें मित्र यमराज, डूब कर खुद मर जाओ।
बेटी झेले दर्द, उसे मिल सभी बचाओ।।६५
कैसे हो पहचान, आज हमको समझाओ।
फिर तुम उसके बाद, गीत अपने सब गाओ।।
कहें मित्र यमराज, बने कुछ धर्म-धुरंधर।
बेशर्मी से रोज, उछलते जैसे बंदर।। १६६
प्रलय प्रकति का आज, उठाए मुँह आ जाता।
इसने भी तो जोड़, लिया विकास से नाता।।
कहें मित्र यमराज, लिखें हम आप कहानी-
देती आँख तरेर, समझ क्या किसको आता।।१६७
खास नहीं ये आम, छिपा कर मन में अपने।
बाँधे मन में गाँठ, देखता नूतन सपने।।
कह सकता है कौन, राज दुबकाए मन में।
यही बात यमराज, हमें समझाते वन में।।१६८
बरसा मेघ अपार, नगर जलमग्न समूचा।
खड़ी बीच है राह, लबालब गली व कूचा।।
जनमानस हैरान, प्रभु जी अब क्या होगा।
क्या हम अपना पाप, आज भोगते रोगा।।१६९
झूठ और पाखंड, रोग बढ़ता जहरीला।
भगवा की ले आड़, रंग फैले भड़कीला।।
यह कैसा है धर्म, नहीं जिसकी मर्यादा।
बनते क्यों हैं लोग, लोभ लालच में प्यादा।।१७०
विधि का अजब विधान, भूल बनते हम ज्ञानी।
कटु है मेरी बात, आप सब हो अभिमानी।।
कहें मित्र यमराज, भूल क्यों करते भारी।
नहीं मुझे अफसोस, हमें कितना दो गारी।।१७१
माया है प्रभु राम, चढ़ावा चोरी होना।
पापी मन का पाप, उजागर सारा होना।।
कहें मित्र यमराज, भले व्याकुलता भारी।
भले दिख रहे मौन, करें वो लीला सारी।।१७२
सावन की बरसात, कृषक मन को है भाती।
रिमझिम पड़े फुहार, दृश्य हरियाली छाती।।
सखियाँ उठती झूम, पड़े बागों में झूले-
छेड़ें वो सब तान, गीत सब मिलकर गाती।।१७३
आज बहुत दुर्व्यवहार, दिनों दिन बढ़ता जाता।
कैसा आया वक्त, हुआ हर दूषित नाता।।
कहें मित्र यमराज, देखिए कलयुग लीला।
ईश्वर भी हैरान, देख मानव जहरीला।।१७४
तुमको भले न याद, दौर कल का था कैसा।
प्यार मोहब्बत खूब, मगर था कितना पैसा।।
कहें मित्र यमराज, नहीं देखे तुम जिनको।
वही आज आधार, गए हैं देकर तुमको।।१७५
सोचे विवश किसान, भला कैसे हो खेती।
धरा हुई है आज, ठीक जैसे हो रेती।।
जीव-जंतु बेहाल, प्राण संकट में आया।
बिन वर्षा से आज, सूखती धरती काया।।१७६
आज नहीं वो बात, आप हम सबने देखा।
दिया गया है खींच, नये युग में जो रेखा।।
होता अब प्रतिघात, धीरे-धीरे सब घटता।
रोना है बेकार, कलेजा अपना फटता।।१७७
राजनीति के खेल, बड़े हो रहे निराले।
लक-दक ऊपर दीख, मगर भीतर बहु काले।।
नहीं दीन है धर्म , आज कुछ इसका नाता।
सीधा सा इंसान, भला इसको कब भाता।।१७८
मन में रखना धीर, सत्य कड़ुआ तुम बोलो।
खुल जाएगा भाग्य, अगर पहले खुद तोलो।।
नदिया करें निनाद, बहे पवन पुरवाई।
कोयल कूके बाग, मोहती ऋतु मनभाई।।१७९
जल भराव चहुँओर, हुई वर्षा जब भारी।
हुई आज नाकाम, सभी की सब तैयारी।।
कहें मित्र यमराज, इंद्र की कैसी माया।
लगता हुआ सवार, भूत की जालिम छाया।।१८०
बहु सुख देगा मीत, द्वार जब पेड़ लगाया।
तब गाएँ हम गीत, मिले फल लकड़ी छाया।।
कहें मित्र यमराज, दिखेगी तब हरियाली।
जब होंगे हम आप, वृक्ष के प्यारे माली।।१८१
लगती नहीं लगाम, समय आया है ऐसा।
सिर्फ चाहिए आज, सभी को केवल पैसा।।
कहें मित्र यमराज, बात कुछ हमें न जमती।
भले हमारी बात, कलेजे सबके लगती।।१८३
कठिन प्रश्न है आज, चुनौती इतनी भारी।
कैसे हो उपचार, करें कैसी तैयारी।।
कहें मित्र यमराज, रहे अब नहीं उधारी।
जागो अब सरकार, शुरू कर अपनी बारी।।१८४
कौन जगत में आज, भला इतना अज्ञानी।
जानबूझकर लोग, खूब करते शैतानी।।
भटक रहा इंसान, दोष दूजे को देते।
पूछे खुद ही लोग, नहीं अब तक क्यों चेते।।१८५
करो नहीं तकरार, नहीं हम हैं अपराधी।
भूले शिष्टाचार, मान लो आप उपाधी।।
कहें मित्र यमराज, नया अब रंग चढ़ा है।
मानो मेरी बात, आदमी बहुत कढ़ा है।।१८६
इंद्रदेव जी आप, हठी मत बनिए इतना।
सूख रहे हैं होंठ, नहीं तुम जानो कितना।।
कहें मित्र यमराज, आप इतना मत ऐंठो।
कर पूरा कर्तव्य, आप फिर सोते बैठो।।१८७
जल भराव चहुँओर, हुई वर्षा जब भारी।
हुए आज नाकाम, सभी की सब तैयारी।।
कहें मित्र यमराज, इंद्र की कैसी माया।
गुस्से में अब लोग, खूब उनको दें गारी।।१८८
कौन हमारी बात, भला कोई क्यों सुनता।
हम तो केवल आज, बने पिछलग्गू जनता।।
कहें मित्र यमराज, उठाओ सिर पर बोझा।
देता नेक सलाह, यही कलयुग का ओझा।।१८९
मत डालो व्यवधान, नहीं तो मुश्किल होगी।
फिर मत कहना आप, बने हम नाहक रोगी।।
रहना हमसे दूर, यही बस अच्छा होगा।
पहले जाकर पूछ, जिसे उन सबने भोगा।।१९०
सुधीर श्रीवास्तव