धूप खिलेगी:
धूप खिलेगी, बिछेगी
और समेट ली जायेगी,
जीवन आयेगा, चलेगा
और समेट लिया जायेगा।
आन्दोलन बनेंगे, बिछेंगे
और मुरझाने दिये जायेंगे,
यदि सत्ता तक पहुँचे
तो झगड़ने लगेंगे।
हर नदी का स्रोत
स्वच्छ होता है,
फिर वह बहेगी,बिछुड़ेगी
और समुद्र में डूब जायेगी।
जीवन सत्य से उपजता
झूठ में लिपटता है,
मीलों चलकर
सत्य में डूब जाता है।
अभी-अभी जो सुबह थी
वह शाम बन जायेगी,
पृथ्वी मृत्यु के बाद
हमें नहीं जगा पायेगी।
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*** महेश रौतेला