मैं और मेरे अह्सास
आसमान तक जाना हैं
हौसला बढ़ाके आसमान तक जाना हैं l
दूर क़ायनात से भी दूर निकलना हैं ll
सुबह शाम आगे बढ़ते हुए रुके बिना l
सूरज और चांद के साथ चलना हैं ll
कायनात की खूबसूरती के साथ ओ l
प्राकृति की गोद में यूँही पलना हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह