अनाथ का सपना
बारिश की हल्की बूंदें मिट्टी की खुशबू फैला रही थीं। शहर के किनारे बने एक छोटे से अनाथालय की टूटी खिड़की के पास 12 साल का आरव आसमान की ओर देख रहा था। उसकी आँखों में एक ही सपना था—"एक दिन मैं ऐसा इंसान बनूँगा, जिस पर पूरा देश गर्व करेगा।"
आरव को अपने माता-पिता का चेहरा भी याद नहीं था। बचपन में ही एक सड़क दुर्घटना में उसने उन्हें खो दिया था। अनाथालय ही उसका घर था और वहीं के बच्चे उसका परिवार।
स्कूल में कई बच्चे उसे चिढ़ाते थे।
"अरे, इसका तो कोई अपना ही नहीं है!"
ये शब्द उसके दिल को चीर देते, लेकिन वह कभी हार नहीं मानता। वह मन ही मन कहता—
"ईश्वर ने शायद मेरा परिवार छीन लिया है, लेकिन मेरा भविष्य नहीं।"
दिन में वह स्कूल जाता और शाम को अनाथालय की लाइब्रेरी में घंटों पढ़ता। किताबें ही उसकी सबसे अच्छी दोस्त थीं। इतिहास, संविधान, महान लोगों की जीवनी—जो मिलता, वह पढ़ डालता।
एक दिन स्कूल में भाषण प्रतियोगिता हुई। विषय था—"मेरा भारत, मेरा भविष्य।"
जब आरव मंच पर पहुँचा तो कुछ बच्चे हँसने लगे। लेकिन उसने पूरे आत्मविश्वास से बोलना शुरू किया।
उसने कहा—
"किसी इंसान की पहचान उसके माता-पिता नहीं, उसके कर्म बनाते हैं। अनाथ होना मेरी कमजोरी नहीं, बल्कि मुझे मजबूत बनाने वाली परीक्षा है।"
पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा।
मुख्य अतिथि, जो एक सेवानिवृत्त शिक्षक थे, उसकी बातों से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उसकी आगे की पढ़ाई का पूरा खर्च उठाने का निर्णय लिया।
अब आरव पहले से भी अधिक मेहनत करने लगा। उसने कभी अपनी परिस्थितियों को अपनी मंज़िल के बीच नहीं आने दिया।
साल बीतते गए।
एक दिन वही आरव देश की प्रतिष्ठित सिविल सेवा परीक्षा में सफल हुआ। जब वह अधिकारी बनकर पहली बार उसी अनाथालय पहुँचा, जहाँ उसने अपना बचपन बिताया था, तो बच्चों की आँखों में चमक आ गई।
उसने बच्चों से कहा—
"याद रखो, अनाथ वह नहीं जिसके माता-पिता नहीं हैं। असली अनाथ वह है, जो अपने सपनों को छोड़ देता है। जब तक तुम्हारे सपने ज़िंदा हैं, तब तक तुम्हारे साथ भगवान भी हैं।"
उसने उस अनाथालय के लिए एक आधुनिक पुस्तकालय बनवाया, कंप्यूटर लैब शुरू करवाई और हर बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी ली।
उस दिन आरव ने महसूस किया कि उसका सबसे बड़ा सपना केवल अधिकारी बनना नहीं था। उसका असली सपना था—किसी और बच्चे के सपनों को टूटने से बचाना।
उसकी कहानी पूरे देश में प्रेरणा बन गई। लोग उसे उसके पद से नहीं, बल्कि उसके संघर्ष और सेवा-भाव से पहचानने लगे।
सीख:
जन्म हमारी पहचान नहीं बनाता, हमारे कर्म बनाते हैं। परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन हों, जो अपने सपनों पर विश्वास रखता है, एक दिन वही दूसरों के जीवन में उम्मीद की रोशनी बनता है।