एक बार जो तुमसे मिल पाता,
डूबते हुओं का यों साहिल पाता
हाल दिल का क्या सुनाऊँ
जिऊँ कि मर ही जाऊँ
इन भटकते जज्बातों का
हाय, क्या मैं हासिल पाता।
मिटा दो मेरी इस हस्ती को
जला दो दिल की बस्ती को,
क्या समझोगे मेरे जज्बातों को
खुद को ही मैं हूँ जाहिल पाता!