कुछ अनसुलझी पहेलियाँ
उन्होंने कभी नहीं रोका
न टोका किसी राह पर
पर क्यों?
एक अदृश्य डोर खिंची रही
मैं खुल कर कभी चल न पाई
एक चिरस्थायी भय
मन के किसी कोने में दुबका रहा
चीजें खरीदने की छूट थी
पसंद चुनने की आज़ादी भी थी
पर बाज़ार की भीड़ में
मेरी उँगलियाँ जम सी जाती थीं
पसंद मेरी ठहर जाती थी
हर जगह मुझे आगे किया गया
मेरी छोटी से छोटी बात पर
पलकों का बिछौना बिछाया गया
बच्चों जैसी हर ज़िद पूरी हुई
फिर भी क्यों?
खुशी का वह रंग
दिल तक पहुँच ही नहीं पाया
वे कहते थे अक्सर
तुम्हारा मन जो चाहे करो
तुम बढ़ो आगे
मैं तुम्हारी परछाई बनकर साथ हूँ
तुम्हें कभी गिरने न दूँगा
बस जी लो अपनी ज़िंदगी खुलकर
वे कहते रहे
शब्दों के झरने बहाते रहे
पर मेरी उड़ान धीमी ही रही
उफ्फ ये कैसी उलझन है
कितना सोचा मैंने खुद के बारे में
कितनी रातें जाग कर बिताईं
फिर एक धीमी सी आवाज़ आई
रोकने वाला कोई नहीं था
बाहर से तो कोई बंधन न था
शायद इजाज़त
मैंने खुद को ही कभी दी नहीं
यह कैद बाहर की नहीं थी
यह दीवारें मेरे भीतर थीं
जहाँ मेरी मर्ज़ी
मेरी ही आवाज़ से दब गई
अनकही अनसुनी सी
बस एक सवाल बनकर रह गई
यह मौन स्वीकृति
किस डर की देन थी
मैं आज तक समझ न पाई।
🥰sarwat fatmi 🥰