Hindi Quote in Poem by Sudhir Srivastava

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अंतिम संस्कार का ठेका
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आज सुबह से मन बड़ा खिन्न था
कुछ सोच रहा था, मगर समझ नहीं पा रहा था,
तब तक मेरी नजर यमराज पर पड़ी
आज उसने पहन रखी थी घड़ी।
मैंनें उसे अपने पास बुलाया
और घड़ी की ओर इशारा करते हुए पूछा
कहीं इनाम पाया या फिर चुरा लाया
उसने मेरा हाथ पकड़कर बैठाया और फरमाया
इस घड़ी की माया से ही तो मैं तुझे नजर आया,
पर लगता है कि नाहक मैंनें खुद को फँसाया।
मैंने झुँझलाते हुए कहा - जरा मैं भी तो सुनूँ
तू कहाँ फँस गया भाया।
यमराज ने कहा - प्रभु! समय के साथ चलना सीखिए,
कलयुग की माया को भी जानिए,
मरने से पहले अपने अंतिम संस्कार का
यथाशीघ्र अग्रिम इंतजाम कर लीजिए।
फिर आज मरो या कल कोई फर्क नहीं पड़ेगा,
अच्छा है मेरी सलाह पर अमल कीजिए
मरने से पहले हर हाल में ऐसा इंतजाम कर लीजिए।
इतना नहीं कर सकते तो मेरे भरोसे
मरने के बारे में सोचना ही छोड़ दीजिए।
मैं हड़बड़ाया - तू ये क्या बकवास कर रहा है?
भला ऐसा कैसे हो सकता है?
यमराज गुस्से से तमतमाया - यार तू निपट अनाड़ी है,
जो अपने आस-पास भी नहीं देख पाता है,
जाने कितने हैं जिनका अंतिम संस्कार नहीं हो पाता है।
अर्थ की इस दुनिया में अपनों के पास अब
ऐसे फालतू कामों के लिए समय नहीं है भाया,
लाखों करोड़ों के मालिक तक को भी
किसी तरह लावारिसों की तरह गया निपटाया,
तू मेरा यार है, इसलिए तुझे समझाया।
यमराज की बात सुन मैं चौंक गया
और अपने अंतिम संस्कार का ठेका
कमीशन काटकर उसे ही दे दिया,
लावारिसों की तरह अंतिम संस्कार का
अपना छोड़, उसका डर दूर कर दिया।
आखिर वो मेरा यार है यार
उसने यार होने का फ़र्ज़ निभाया
तो मैंने भी यारी को नव आयाम दे दिया।

सुधीर श्रीवास्तव

Hindi Poem by Sudhir Srivastava : 112017647
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