“केवलाघो भवति केवलादी” (ऋग्वेद 1/117/4) का भाव—जो केवल अपने लिए ही खाता है, वह पाप का भागी होता है—यह वैदिक परंपरा में बार-बार आया हुआ नैतिक सिद्धान्त है। इसी आशय के अन्य शास्त्रीय प्रमाण, संक्षेप में और प्रमाण सहित, नीचे दिया जा रहा है।
* ऋग्वेद से ही समान भाव
ऋग्वेद- 10/117/6
न स सखा यो न ददाति सख्ये।
भावार्थ –
जो मित्रता में देता नहीं , वह सच्चा मित्र नहीं है।
(अर्थात् जो बाँटता नहीं, वह सामाजिक और नैतिक रूप से दोषी है)
* भगवद्गीता से प्रमाण
गीता-- 3/13
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥
भावार्थ –
यज्ञ (दान, परमार्थ) के बाद जो भोजन करते हैं, वे पाप से मुक्त होते हैं; और जो केवल अपने लिए ही पकाते हैं, वे पाप ही खाते हैं।
➡️ यह श्लोक सीधे “केवलाघो भवति” की व्याख्या है।
* उपनिषद् से प्रमाण
ईशोपनिषद् – मंत्र-- 1
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।
भावार्थ –
त्यागभाव से भोग करो, किसी के धन का लोभ मत करो।
➡️ यहाँ “त्यागपूर्वक भोग” का उपदेश है, न कि अकेले उपभोग का।
* मनुस्मृति से प्रमाण
मनुस्मृति-- 4/29
अतिथिं योऽनवाप्तं स्यात् स भुञ्जीत कदाचन।
अन्नं हि प्राणिनां प्राणाः।
भावार्थ –
अतिथि को बिना भोजन कराए स्वयं भोजन नहीं करना चाहिए;
क्योंकि अन्न ही प्राणियों का प्राण है।
*. महाभारत से प्रमाण--
(क) महाभारत – अनुशासन पर्व
अन्नं बहु कुर्वीत तद्व्रतं साधुसम्मतम्।
भावार्थ –
अन्न बहुतों के लिए बनाना चाहिए; यही सज्जनों द्वारा मान्य व्रत है।
➡️ आशय: जो अकेले खाने के लिए अन्न बनाता है, वह धर्ममार्ग से हटता है।
(ख) महाभारत – वनपर्व
यो न ददाति स भुञ्जानो भुङ्क्ते पापमेव तु।
भावार्थ –
जो दान नहीं करता और स्वयं भोग करता है, वह वास्तव में पाप ही भोगता है।
➡️ यह सीधे “केवलाघो भवति” का प्रतिध्वनित भाव है।
(ग) महाभारत – शान्तिपर्व
न यंतस्य सुखमस्त्यत्र यो भुङ्क्ते केवलं स्वयम्।
भावार्थ –
जो केवल अपने लिए भोग करता है, उसे इस लोक में भी सुख नहीं मिलता।
* हितोपदेश से प्रमाण--
(क) हितोपदेश – मित्रलाभ
अदानं भोजनं पापं दानं धर्मः सनातनः।
भावार्थ –
दान न करके भोजन करना पाप है; दान करना सनातन धर्म है।
(ख) हितोपदेश – सुहृद्भेद
भुञ्जीत केवलं पापी न साधुर्न कदाचन।
भावार्थ –
केवल अपने लिए खाने वाला पापी होता है; साधु ऐसा नहीं करता।
(ग) हितोपदेश – नीति-वाक्य
स्वार्थाय पच्यते यत्र तत्र धर्मो न विद्यते।
भावार्थ –
जहाँ भोजन केवल स्वार्थ के लिए पकाया जाता है, वहाँ धर्म नहीं रहता। अवश्य !“केवल अपने लिए भोग करना पाप/अधर्म है, दानपूर्वक भोग ही नीति है”—इस भाव के भर्तृहरि और चाणक्य से प्रामाणिक नीति-श्लोक नीचे दिया जा रहा है—
* भर्तृहरि (नीतिशतकम्) से प्रमाण __
(क) नीतिशतकम्
त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः
नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय।
भावार्थ –
केवल त्याग से ही अमरत्व (यश, पुण्य) प्राप्त होता है;
इसके अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है।
➡️ आशय: संग्रह और अकेला भोग नीति नहीं, त्याग ही धर्म है।
(ख) नीतिशतकम्
भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद्भयं।
माने दैन्यभयं बले रिपुभयं रूपे जराभ्यां भयम्॥
सर्वं वस्तु भयावहं भुवि नृणां त्यागः सुखावहः॥
भावार्थ –
भोग में रोग का भय है; धन में राजा का भय है;
संसार की हर वस्तु भययुक्त है—
केवल त्याग ही सुखदायक है।
➡️ भोगप्रधान जीवन (केवल अपने लिए) को भर्तृहरि ने दुःखमूल कहा।
(ग) नीतिशतकम्
परार्थे यः परित्यागः स एव पुरुषोत्तमः।
भावार्थ –
जो दूसरों के लिए त्याग करता है, वही श्रेष्ठ पुरुष है।
* चाणक्य (चाणक्य नीति) से प्रमाण --
(क) चाणक्य नीति--
दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥
भावार्थ –
धन की तीन गतियाँ हैं—
दान,भोग,नाश
जो न दान करता है, न भोग करता है—उसका धन नष्ट हो जाता है।
➡️ यहाँ भोग भी दान-संयुक्त माना गया है, न कि अकेला स्वार्थ।
(ख) चाणक्य नीति--
अत्याचारो न कर्तव्यः केवलार्थेन पण्डितैः।
भावार्थ –
केवल अपने स्वार्थ के लिए कोई कार्य (भोग भी) पण्डित नहीं करता।
(ग) चाणक्य नीति--
स्वार्थमात्रपरो लोके स पापेनैव जीवति।
भावार्थ –
जो केवल स्वार्थ में ही लगा रहता है, वह पापमय जीवन जीता है।
अवश्य। “केवल अपने लिए भोग करना अधर्म है, दान-सहित भोग ही धर्म है”—इस भाव के श्रीमद्भागवत तथा उससे सम्बद्ध पुराणीय परम्परा से प्रामाणिक उद्धरण नीचे दिए जा रहे हैं—
1. श्रीमद्भागवत महापुराण से प्रमाण--
(क) श्रीमद्भागवत 7.14.10
(प्रह्लाद का गृहस्थ-धर्म उपदेश)
अदत्त्वा यो भुङ्क्ते भोक्ता स स्तेन एव कीर्तितः।
भावार्थ –
जो बिना दान किए भोग करता है, वह वास्तव में चोर कहा गया है।
➡️ यह श्लोक “केवलाघो भवति” का भागवत-रूप है—
अकेला भोग = अधर्म।
(ख) श्रीमद्भागवत 7.14.8
गृहस्थोऽतिथिदानैश्च यज्ञैश्च भजते हरिम्।
भावार्थ –
गृहस्थ अतिथि-सेवा और दानरूप यज्ञों द्वारा भगवान का भजन करता है।
➡️ जो बाँटता नहीं, वह ईश्वर-भजन से भी वंचित रहता है।
(ग) श्रीमद्भागवत 1.2.13
अतः पुम्भिर्द्विजश्रेष्ठा वर्णाश्रमविभागशः।
स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिर्हरितोषणम्॥
भावार्थ –
सभी वर्ण-आश्रम धर्मों की सिद्धि हरि-तोषण में है।
➡️ और हरि-तोषण का मार्ग—दान, सेवा, परमार्थ—अकेला भोग नहीं।
* पुराणीय प्रमाण--
(क) विष्णु पुराण--
अतिथिं योऽनवाप्तं स्यात् स भुङ्क्ते पापमेव तु।
भावार्थ –
जो अतिथि को बिना भोजन कराए स्वयं भोजन करता है,
वह पाप ही भोगता है।
(ख) पद्म पुराण--
स्वार्थाय पच्यते यत्र न तत्र हरिरालयः।
भावार्थ –
जहाँ भोजन केवल स्वार्थ के लिए पकता है,
वहाँ भगवान का वास नहीं होता।
(ग) नारद पुराण-
दानं हि धर्मः परमः स्मृतो लोके सनातनः।
अदानेन तु यो भुङ्क्ते स पापी नरकोद्भवः।
भावार्थ –
दान सनातन धर्म है;
जो बिना दान के भोग करता है, वह पाप का भागी होता है।
✨ समग्र निष्कर्ष (वैदिक → भागवत परम्परा)
ऋग्वेद → गीता → महाभारत → भर्तृहरि → चाणक्य → श्रीमद्भागवत
सबका एक ही सिद्धान्त है—
केवल अपने लिए खाना = पाप / चोरी / अधर्म।
दान-युक्त भोग = धर्म / यज्ञ / भक्ति।
साझा अन्न = ईश्वर-पूजा है।
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