“न स सखा न ददाति सख्ये”
ऋगुवेद --10/117/4
भावार्थ--“वह मित्र नहीं है, जो सहायता नहीं देता।
सम्बन्धित उद्धरण--
* द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया
समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति
अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥
मुण्डकोपनिषद--3/1/1
अर्थ:
एक ही वृक्ष पर बैठे दो मित्र पक्षी हैं। एक फल खाता है, दूसरा केवल साक्षी भाव से देखता है।
* ईशावास्यमिदं सर्वं
यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा
मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥
--ईशोपनिषद(मंगलाचरण)
भावार्थ-
त्याग और सहभागिता ही जीवन का आधार है। जो केवल अपना ही सोचे, वह मित्रता निभाने योग्य नहीं।
महाभारत, उद्योग पर्व--
* सुखेषु सर्वे सखिनो भवन्ति
दुःखेषु मित्रं विरलः भवति।
--महाभारत(उद्योग पर्व)
अर्थ:
सुख में तो सभी मित्र होते हैं,
दुःख में साथ देने वाला मित्र दुर्लभ होता है।
* न मित्रं कपटं कृत्वा
मित्रभावेन वर्तते।
---महाभारत, वनपर्व
अर्थ:
जो छलपूर्वक मित्रता करता है,
वह वास्तव में मित्र नहीं होता।
* आपत्सु मित्रं यः करोति धीरः
स एव मित्रं न तु दीर्घसूत्री।
सुखेषु सर्वे सखिनो भवन्ति
दुःखेषु मित्रं विरलः भवति॥
--भृतहरि, नीतिशतक
अर्थ:
जो व्यक्ति विपत्ति के समय साथ देता है, वही वास्तव में मित्र है।
सुख के दिनों में तो सभी मित्र बन जाते हैं, पर दुःख में साथ देने वाला मित्र बहुत ही दुर्लभ होता है।
👉 यह श्लोक सीधे उसी भाव को पुष्ट करता है—
जो मित्रता में कुछ देता नहीं, संकट में साथ नहीं देता, वह सखा कहलाने योग्य नहीं।
* पापान्निवारयति योजयते हिताय. गुह्यं निगूहति गुणान् प्रकटीकरोति । आपद्गतं च न जहाति ददाति काले. सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः।। ---हितोपदेश-
भावार्थ --
.सज्जन लोग एक अच्छे मित्र का लक्षणों को कुछ इस तरह व्यक्त करते हैं... जो मित्र पापों का नाश करता है, मित्र की कल्याण के लिए योजना बनाता है, मित्र की बुरी आदतों को लोगों से छुपाकर उसकी अच्छी आदतों का प्रचार
करता है।