कल मैंने
भीड़ से लथपथ एक सड़क पर
एक आदमी को देखा..
सब्ज़ी बेचता हुआ...
आँखें उसकी
मानो रातों से उधार ली हुई हों...
जागती हुई नहीं,
पर बुझी हुई भी नहीं
नाक में नली थी,
जैसे जीवन को किसी अदृश्य मशीन से
घसीट-घसीट कर खींच रहा हो..
बीमार था...
शायद बहुत बीमार...
पर बीमारी से ज़्यादा
वह भूख से लड़ रहा था,
और भूख से ज़्यादा
जीवन से झगड़ रहा था
वह हार मानने आया नहीं था
वह तो
उन्हें हराने की पूरी तैयारी में बैठा था
मृत्यु को, दया को,
और उस व्यवस्था को
जो आदमी को पहले थकाती है
फिर उसे भीख का पात्र बनाती है
उसके आगे
न कोई चादर बिछी थी,
न कोई कटोरा रखा था
उसने न इंसान से याचना की थी,
न भगवान से सौदेबाज़ी..
वह सड़क पर बैठा मेहनत का सामान लेकर
स्वाभिमान लेकर
वह आदमी...
मुझे हौसला दे रहा था
कि ज़िंदगी से
थोड़ा और साहस से
आँखें मिलाई जा सकती हैं
मैंने महसूस किया..
क्रांति कभी
नारे लगाती नहीं,
कभी-कभी
नाक में नली लगाए
सब्ज़ी बेचती हुई
चुपचाप..
सड़क पर बैठी होती है
~रिंकी सिंह