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Manoj kumar shukla

Manoj kumar shukla Matrubharti Verified

@manojkumarshukla2029
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फिलिस्तिन इसराइल का.....(दोहे)

फिलिस्तिन इसराइल का, शुरू हुआ था युद्ध।
अमरीका-इरानी तब, कूद पड़े थे क्रुद्ध।।

हिजबुल्ला हूति हमास, आतंकी पर्याय।
धर्मोन्मादी फौज को, देख सभी थर्राय।।

परमाणू बम की कथा, जग में मचा बवाल।
अमरीका बाहें चढ़ा, ठोंके अपनी ताल।।

धर्म लबादा ओढ़कर, मानवता का ह्रास।
मुट्ठी में दुनिया समझ, करते सत्यानाश।।

इजराइल अभिमन्यु बन, बीच फँसा है देश।
दुश्मन की सेना खड़ी, विकट रहा परिवेश।।

समय परिस्थिति ने उसे, बना दिया है शेर।
सीना ताने वह खड़ा, दुश्मन माँगे खैर।।

युद्ध गए हैं अब बदल, ना घोड़ा तलवार।
घर में ही अब बैठकर, करते शत्रु प्रहार।।

ड्रोन मिसाइल दागते, जनता को है क्लेश।
जीना दूभर हो गया, मानव-दुश्मन देश।।

हार्मोस के रूट में, बाधित किए जहाज।
दिल की धड़कन बंद कर, मानव-पंगु-समाज।।

रोक तेल की धार को, ढाया सब पर जुल्म।
संकट की बेला खड़ी, कैसे टूटे इल्म।।

समवर्ती कुछ देश भी, फँसे हुए हैं जाल।
मुस्लिम खाड़ी देश का, बड़ा बुरा है हाल।।

इधर कुआँ खाई उधर, सभी रहे हैं डूब।
बनी धुरंधर फिल्म अब, चली जगत में खूब।।

झगड़े की यह पटकथा, दो देशों के बीच।
आग लगी है तेल में, देश फँसे हैं कीच ।।

विश्व युद्ध का बिगुल सुन, बजा हुआ है आज।
दो ईश्वर सद्बुद्धि अब, रहे शांति का राज ।।

मनोजकुमार शुक्ल 'मनोज'

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भारत की है शान, वंदेमातरम.....

भारत की है शान, वंदेमातरम।
बंकिम जी का गान वंदेमातरम।।

गोरों से लड़ी लड़ाई थी सबने।
आजादी का ज्ञान वंदेमातरम।।

गाथाएँ बलिदानों से भरी हुईं।
जनता की अब तान, वंदेमातरम।।

गांधी सुभाष आजाद भगत नारा।
स्वतन्त्रता बलिदान, वंदेमातरम।।

झुका न पाया कभी तिरंगा कोई।
रखे हथेली जान,वंदेमातरम।।

परिवर्तन आंदोलन का शस्त्र बना।
इस पर है अभिमान,वंदेमातरम।।

सैनिक कर्ज चुकाते हैं सीमा पर
कर्तव्यों का भान,वंदेमातरम।।

कदम-कदम ऊँचाई पर है बढ़ना।
लिया देश ने ठान, वंदेमातरम।।

राष्ट्रभक्ति की अलख जगाएंगे मिल।
गाएंगे सब गान, वंदेमातरम।।

मनोजकुमार शुक्ल मनोज

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जग डूबा *अवसाद* में, छेड़ा जबसे युद्ध।
दोनों को समझा सकें, कहाँ से लाऊँ बुद्ध।।

विश्व प्रेम आराधना, सुख शांति *प्रासाद*।
हिल -मिलकर सब रह सकें, हटे दूर उन्माद।।

गीता के *प्रतिसाद* में, कर्म भाव ही तत्व।
जिसने जीवन को जिया, उसका बढ़ा महत्व।।

जीव जगत को है मिला, आशीर्वाद *प्रसाद*।
नेक राह पर चल पड़ो, कभी न हो उन्माद।।

मनोज कुमार शुक्ल मनोज
1/4/26

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गूँजा है आकाश धरा में, फिर से वंदेमातरम....

गूँजा है आकाश धरा में, फिर से वंदेमातरम।
आजादी की जली मशालें,गाया वंदेमातरम।।

बंकिमचंद्र चटर्जी जी ने, लिखी वंदना राष्ट्र की।
गाया हम सबने मिल करके, मंत्रित वंदेमातरम।।

हमने जननी जन्म भूमि को, माँ का दर्जा दिया सदा।
मातृभूमि की बलिवेदी में, वंदित वंदेमातरम।।

उत्तर पूरब पश्चिम दक्षिण, दश दिशाओं को भाया।
भाषा की टूटी दीवारें, गूँजा वंदेमातरम।।

धर्म कहाँ तब आड़े आया, दिल को आजादी भाई।
मिल कर गाया एक स्वरों में , सबने वंदेमातरम।।

सुदृढ़ अब अर्थ व्यवस्था, देश प्रगति करता यारो।
विश्व अग्रणी बने देश यह, गाएँ वंदेमातरम।।

मनोजकुमार शुक्ल 'मनोज'

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विश्व जगत-उत्साह देखिए...

विश्व जगत-उत्साह देखिए।।
भारत की अब थाह देखिए ।।

सभी देश में छाया भारत।
बने दिलों की चाह देखिए।।

कहते अर्थव्यवस्था चौथी।
शत्रु देश की डाह देखिए।।

दर-दर भटके पाकिस्तानी।
लगी पेट में दाह देखिए।।

जग-बाजार खुला अब ऐसा
लगी-कतारें राह देखिए।।

अमरीका ने करवट बदली।
जग में भारत शाह देखिए।।

भारत की संस्कृति ही ऐसी।
गूँज उठी है वाह देखिए।।

मनोजकुमार शुक्ल 'मनोज'
12/2/26

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सेना करे कमाल देखिए।
दुश्मन की हर चाल देखिए।।

सीमा पर चौकस रहते हैं।
राष्ट्र भक्ति की ढाल देखिए।।

जो भी कदम मिला कर बढ़ते।
उनका ऊँचा भाल देखिए।।

अनुशासन में पगे हुए सब।
दुश्मन है बेहाल देखिए।।

करें सुरक्षा हम सबकी वे।
रखें हमारा ख्याल देखिए।।

कर्तव्य भाव का बोध सदा।
इस पर नहीं सवाल देखिए।।

मनोज कुमार शुक्ल "मनोज"
7/2/26

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गीत
1 नए वर्ष में खुशहाली का......####

नए वर्ष में खुशहाली का,
मंगलमय संदेश मिले।
जन गण मन को स्वस्थ निरोगी,
सुखदाई परिवेश मिले।

जीवन सबका जगमग दमके,
सुख की हर बदली बरसे।
छल-छद्मों के जाल कटें सब,
प्रेम-बेल उर में सरसे।

मानव पर यदि तम घिर जाए,
कभी न उसको क्लेश मिले ।
नए वर्ष में खुशहाली का,
मंगलमय संदेश मिले।

नये वर्ष में सुख यश वैभव,
नित नूतन संगीत बजे।
नई सर्जना नई चेतना,
मधुर-मधुर नवप्रीत सजे।

मिले सभी को तरुवर छाया,
निष्कंटक पथ कानन हो।
अंतरघट में बजे बाँसुरी,
मन-भावन वृंदावन हो।

द्वार तुम्हारे चलकर पहुँचें,
कृष्ण-सखा योगेश मिले।
नए वर्ष में खुशहाली का,
मंगलमय संदेश मिले।

मिले सुजन-सान्निध्य सभी को,
कलयुग में द्वापरयुग-सा।
सत्य न्याय का शंखनाद हो,
रामराज्य सम सतयुग-सा ।

चहुँ विकास के पथ पर सबको,
लेकर साथ सदा बढ़ते।
मित्र सुदामा बने अगर तो,
उनका भी मंगल करते।

भटके राही के चिंतन को,
यथा उचित निर्देश मिले।
नए वर्ष में खुशहाली का,
मंगलमय संदेश मिले।

शांति और सद्भाव वीरता,
सदियों से अपनी चाहत।
है वसुधा परिवार हमारा,
दीन दुखी का है स्वागत।

गीता की अमृत वाणी को,
जग में फिर सम्मान मिले।
हो अखंड कण-कण भारत का,
विश्व गुरू का मान मिले।

पुनर्जन्म जब हो धरती पर,
हमको भारत देश मिले।
नए वर्ष में खुशहाली का,
मंगलमय संदेश मिले।

पाँच सदी पश्चात हमारे,
राम-लला घर आए हैं।
विश्व जगत में छाईं खुशियाँ,
घर-आँगन मुस्काए हैं।

दो हजार छब्बीस शुभंकर
रामराज्य संदेश मिले।
काशी विश्वनाथ का मंदिर
मथुरा का अखिलेश खिले।

सत्य सनातन की वाणी को
जागृति का गणवेश मिले।
नए वर्ष में खुशहाली का,
मंगलमय संदेश मिले।

मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "

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सजल#
समांत - आना
पदांत- होगा
मात्रा भार- 16
(चौपाई छंद)

जग से तिमिर भगाना होगा ।
नव प्रकाश फैलाना होगा।।

मानव धर्म बड़ा है जग में।
उसको ही अपनाना होगा।

छल-छद्मों के बाजारों से।
जन को सदा बचाना होगा।

नई सदी है राह दिखाती।
नूतन डगर सजाना होगा।।

खड़े भेड़िया हर मोड़ों पर।
उनको धूल चटाना होगा।।

जिहादियत नासूर बना है।
मिल उपचार कराना होगा।।

विधि को ठेंगा दिखा रहे जो।
दंड का डर दिखाना होगा।।

सीमाओं की करें सुरक्षा ।
रिपु-दल दर्प ढहाना हो।।

संस्कृति और सभ्यता रूठी।
उसको फिर हर्षाना होगा।।

मनोज कुमार शुक्ल 'मनोज'

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मेरा साथ निभाना साथी।
मुझे छोड़ मत जाना साथी।।

फेरे लिए अग्नि-पथ के हैं ।
प्रेम सुधा बरसाना साथी।।

सुख-दुख तो आना-जाना है।
इससे मत घबराना साथी।।

जीवन पथ पर चलें निरंतर।
कुछ भी नहीं छिपाना साथी।।

मेरा जो वह सब तेरा है।
ऐसे भाव मिलाना साथी।।

पथ पथरीले राह कठिन है।
उलझन सभी मिटाना साथी।।

ऊँचीं-ऊँचीं बनीं सीढ़ियाँ।
गहकर हाथ चढ़ाना साथी।।

मनोजकुमार शुक्ल 'मनोज'

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सजल
समांत----
पदांत-आना
मात्रा भार-16
(चौपाई छंद)

सोते को है सरल जगाना।
पर जगते को कठिन उठाना।।

जीवन दाँव लगाया फिर भी।
मात-पिता का लुटा खजाना।।

बरगद बनकर छाँव बनाई।
चिड़िया उड़ती सुना बहाना।।

उँगली थामे बड़े हुए पर।
सबल पैर का नहीं ठिकाना।।

उमड़-घुमड़ कर आँसू सूखे।
पर मुखड़े को है हर्षाना ।।

प्रश्न चिन्ह तब लगा हुआ है।
कैसा आया नया जमाना।।

संस्कृति और सभ्यता रूठी।
जागो मानव क्यों पछताना।।

मनोजकुमार शुक्ल 'मनोज'

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