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Manoj kumar shukla

Manoj kumar shukla Matrubharti Verified

@manojkumarshukla2029
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गीत
1 नए वर्ष में खुशहाली का......####

नए वर्ष में खुशहाली का,
मंगलमय संदेश मिले।
जन गण मन को स्वस्थ निरोगी,
सुखदाई परिवेश मिले।

जीवन सबका जगमग दमके,
सुख की हर बदली बरसे।
छल-छद्मों के जाल कटें सब,
प्रेम-बेल उर में सरसे।

मानव पर यदि तम घिर जाए,
कभी न उसको क्लेश मिले ।
नए वर्ष में खुशहाली का,
मंगलमय संदेश मिले।

नये वर्ष में सुख यश वैभव,
नित नूतन संगीत बजे।
नई सर्जना नई चेतना,
मधुर-मधुर नवप्रीत सजे।

मिले सभी को तरुवर छाया,
निष्कंटक पथ कानन हो।
अंतरघट में बजे बाँसुरी,
मन-भावन वृंदावन हो।

द्वार तुम्हारे चलकर पहुँचें,
कृष्ण-सखा योगेश मिले।
नए वर्ष में खुशहाली का,
मंगलमय संदेश मिले।

मिले सुजन-सान्निध्य सभी को,
कलयुग में द्वापरयुग-सा।
सत्य न्याय का शंखनाद हो,
रामराज्य सम सतयुग-सा ।

चहुँ विकास के पथ पर सबको,
लेकर साथ सदा बढ़ते।
मित्र सुदामा बने अगर तो,
उनका भी मंगल करते।

भटके राही के चिंतन को,
यथा उचित निर्देश मिले।
नए वर्ष में खुशहाली का,
मंगलमय संदेश मिले।

शांति और सद्भाव वीरता,
सदियों से अपनी चाहत।
है वसुधा परिवार हमारा,
दीन दुखी का है स्वागत।

गीता की अमृत वाणी को,
जग में फिर सम्मान मिले।
हो अखंड कण-कण भारत का,
विश्व गुरू का मान मिले।

पुनर्जन्म जब हो धरती पर,
हमको भारत देश मिले।
नए वर्ष में खुशहाली का,
मंगलमय संदेश मिले।

पाँच सदी पश्चात हमारे,
राम-लला घर आए हैं।
विश्व जगत में छाईं खुशियाँ,
घर-आँगन मुस्काए हैं।

दो हजार छब्बीस शुभंकर
रामराज्य संदेश मिले।
काशी विश्वनाथ का मंदिर
मथुरा का अखिलेश खिले।

सत्य सनातन की वाणी को
जागृति का गणवेश मिले।
नए वर्ष में खुशहाली का,
मंगलमय संदेश मिले।

मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "

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सजल#
समांत - आना
पदांत- होगा
मात्रा भार- 16
(चौपाई छंद)

जग से तिमिर भगाना होगा ।
नव प्रकाश फैलाना होगा।।

मानव धर्म बड़ा है जग में।
उसको ही अपनाना होगा।

छल-छद्मों के बाजारों से।
जन को सदा बचाना होगा।

नई सदी है राह दिखाती।
नूतन डगर सजाना होगा।।

खड़े भेड़िया हर मोड़ों पर।
उनको धूल चटाना होगा।।

जिहादियत नासूर बना है।
मिल उपचार कराना होगा।।

विधि को ठेंगा दिखा रहे जो।
दंड का डर दिखाना होगा।।

सीमाओं की करें सुरक्षा ।
रिपु-दल दर्प ढहाना हो।।

संस्कृति और सभ्यता रूठी।
उसको फिर हर्षाना होगा।।

मनोज कुमार शुक्ल 'मनोज'

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मेरा साथ निभाना साथी।
मुझे छोड़ मत जाना साथी।।

फेरे लिए अग्नि-पथ के हैं ।
प्रेम सुधा बरसाना साथी।।

सुख-दुख तो आना-जाना है।
इससे मत घबराना साथी।।

जीवन पथ पर चलें निरंतर।
कुछ भी नहीं छिपाना साथी।।

मेरा जो वह सब तेरा है।
ऐसे भाव मिलाना साथी।।

पथ पथरीले राह कठिन है।
उलझन सभी मिटाना साथी।।

ऊँचीं-ऊँचीं बनीं सीढ़ियाँ।
गहकर हाथ चढ़ाना साथी।।

मनोजकुमार शुक्ल 'मनोज'

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सजल
समांत----
पदांत-आना
मात्रा भार-16
(चौपाई छंद)

सोते को है सरल जगाना।
पर जगते को कठिन उठाना।।

जीवन दाँव लगाया फिर भी।
मात-पिता का लुटा खजाना।।

बरगद बनकर छाँव बनाई।
चिड़िया उड़ती सुना बहाना।।

उँगली थामे बड़े हुए पर।
सबल पैर का नहीं ठिकाना।।

उमड़-घुमड़ कर आँसू सूखे।
पर मुखड़े को है हर्षाना ।।

प्रश्न चिन्ह तब लगा हुआ है।
कैसा आया नया जमाना।।

संस्कृति और सभ्यता रूठी।
जागो मानव क्यों पछताना।।

मनोजकुमार शुक्ल 'मनोज'

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सजल
समांत-आर
पदांत-आया
मात्रा भार-11/13

11/13
दीपों का त्यौहार, द्वार तक चल कर आया।
फैला नव-उजियार, घरों में खुशियाँ लाया।।

सजी अयोध्या आज, दिवाली है मुस्काई।
जन्म-भूमि से प्यार, राम मंदिर मनभाया।।

हुआ सनातन एक, बजा अब डंका जग में।
काशी में जयकार, कीर्ति ध्वज है फहराया।।

ब्रज की गलियों में, कृष्ण-वंशी गूँजेगी।
*दिव्य* प्रेम विस्तार, नेह-बादल मँडराया।।

संभल है आजाद, चला कल्की का डंडा।
कलयुग का अवतार, राज-योगी का भाया।।

तुष्टिकरण का रोग, लगा था राजनीति को।
होगा अब उपचार, हटा है काला साया।।

गीता का उपदेश, गूँजता जग में अब तो।
भारत की हुंकार, विश्व है फिर हर्षाया।।

मनोज कुमार शुक्ल "मनोज"
21/10/25

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सजल ..
समांत-
पदांत- आऊँ
मात्रा भार- 16

भटका कब पथ समझ न पाऊँ?
किससे अपनी व्यथा सुनाऊँ??

उलटा घड़ा रखा पनघट में।
कैसे जल-अमृत बरषाऊँ ??

जीवन भर उपकार किया है।
कितना कबतक भार उठाऊँ??

अपनों से फिर चोट मिली है।
कैसे अपनों पर इठलाऊँ??

मैंने सबको दिया सहारा।
बातों पर कैसे इतराऊँ??

दीवारें भाषाओं की हैं।
कैसे उनको मैं समझाऊँ??

सबकी अलग-अलग है पीड़ा।
घावों को कैसे भरपाऊँ??

मनोज कुमार शुक्ल मनोज
5/10/25

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गीत
कुकुभ छंद
मात्रा भार 16/14

प्रभु मुझको वरदान यही दो,
सुख के कुछ पल दो पुलकन।
दुख से चाहे झोली भर दो,
मानवता की हो धड़कन।।

सदा बनूँ दूजा हित साधक,
नहीं किसी से हो अनबन।।

सत्य कह रहा हूँ मैं तुमसे,
जग से मुझको प्यार मिला।
मात-पिता के काँधे चढ़कर,
उनका बड़ा दुलार मिला।।

जीवन भर यादों की पूँजी,
मिला सदा ही अपनापन।

बड़ा हुआ तो घर में अपने,
छोटों से सम्मान मिला।
सानिध्य वरिष्ठों का पाकर,
नित गोदी में लाड़ मिला।।

दोस्तों से खुशियाँ हैं पाईं,
जिसे निभाया आजीवन।।

यौवन में है साथ निभाया,
गृह लक्ष्मी जब घर आई।
सुलझाया मेरी हर उलझन,
वंश लता तब हर्षाई।।

बचपन से आँगन हर्षाया।
तब भविष्य चिंतन मंथन।।

हुई शारदे की अनुकम्पा,
कलम पकड़ ली हाथों में।
मानव की पीड़ा को लिख लिख,
बसा लिया है साँसों में।।

लेखक का कर्तव्य निभाया,
मानवता हित संवर्धन।

जलूँ दीप सा आँगन-आँगन,
तमस हरूँ जग का हरदम।
सुख समृद्धि की वर्षा नित हो,
यही कामना करते हम।।

राष्ट्रभक्ति जन-जन में मचले,
देश प्रेम का अभिसिंचन।।

प्रभु मुझको वरदान यही दो,
सुख के कुछ पल दो पुलकन।
दुख से चाहे झोली भर दो,
मानवता की हो धड़कन।।

मनोजकुमार शुक्ल 'मनोज'

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अनुभूति,अनुश्रुति,अनुकूल,अनुदान,अनुदार*

ईश्वर की अनुभूति पा, होते व्यक्ति महान।
आस्था औ विश्वास से, दृढ़-निश्चय की खान।।

अनुश्रुति के बल पर लिखे, अपने वेद-पुरान।
जीवन की संजीवनी,ऋषि मुनियों का ज्ञान।।

परिस्थितियाँ अनुकूल अब, प्रगतिशील का शोर।
भारत उन्नति कर रहा, निश्चित होगी भोर।।

सरकारी अनुदान पा, करें श्रेष्ठ व्यापार।
श्रमिकों को भी काम दें, उन्नति का आधार।।

मातृ-भूमि ऋण भूल कर, दिखते कुछ अनुदार।
निज स्वार्थों में उलझते, भारत पर हैं भार।।

मनोज कुमार शुक्ल 'मनोज'

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दोहा-सृजन हेतु शब्द*
संन्यास,अभिषेक,आलोक,विरासत,रक्षासूत्र

कर्मठ मानव ही बनें, कभी न लें सन्यास।
जब तक तन में साँस है, करते रहें प्रयास।।

श्रम का ही अभिषेक कर, करें पुण्य के काम।
सार्थक जीवन को जिएँ, जग में होगा नाम।।

सत् कर्मों की हो फसल, करें सभी जन वाह।
दिग्-दिगंत आलोक हो, हर मानव की चाह।।

वरासत को संग्रह करें, होता यह अनमोल।
दर्पण रहे अतीत का, चमके मुखड़ा-बोल।।

रक्षासूत्र प्रतीक है, बंधु भगिनि का प्यार।
रक्षाबंधन पर्व यह, रचे नया संसार।।

मनोज कुमार शुक्ल "मनोज"

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सजल
समांत - अढ़े
पदांत - चलो
मात्राभार - 12+12 = 24

रुको नहीं थको नहीं, तीव्र गति बढ़े चलो।
उद्घोष तुम जय करो, विकास पथ गढ़े चलो।।

इधर-उधर न देख तूँ, साध-दृष्टि सुलक्ष्य पर।
बन गया विजय का रथ, निर्भय हो चढ़े चलो।।

जब घिरी हो कालिमा, प्रकाश पुंज को जला।
नवीन पथ तलाश कर, अतीत को पढ़े चलो।।

अवरोध की जब दिखें, राह में दुश्वारियाँ ।
निराश भाव त्याग कर, तारों को कढ़े चलो।।

सँवारे हर पृष्ठ को, इतिहास को मान दें।
स्वर्णाक्षर में नाम लिख, फ्रेमों में मढ़े चलो।।

मनोज कुमार शुक्ल 'मनोज'
19/8/25

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