( बोझ )
वे अक्सर सुबह के उजाले के साथ आ जाते थे।
करीब सत्तर के होंगे,सिर पर टोकरी, कदमों में थकान, और आवाज़ में वही पुरानी पुकार जो गलियों को पहचान में रखती है।
मैं जब भी उन्हें देखती, कुछ न कुछ ले ही लेती..ज़रूरत हो या न हो। शायद सब्ज़ी से ज़्यादा, उस आदमी को ख़रीदती थी जो रोज़ अपने जीवन को तौल कर बेचता था।
कई दिनों तक वे नहीं आए।
गली कुछ सूनी लगी, जैसे सुबह का कोई ज़रूरी काम अधूरा रह गया हो।
फिर एक दिन दिखे।
सिर पर टोकरी नहीं थी।
कंधे पर एक भारी बोरी टाँगे, उसमें भरी हुई ताज़ी पालक—हरी, मगर खुद उनके चेहरे से हरियाली गायब थी।
मैंने पूछा,
“इतने दिन कहाँ थे, बाबा?”
वे रुके।
हल्की मुस्कान के साथ बोले,
“सर में दर्द था बेटा… पुरानी चोट है। डॉक्टर ने मना किया है वजन उठाने से।”
मैंने राहत की साँस ली..अच्छा है, अब सिर पर बोझ नहीं रखते।
लेकिन तभी देखा..बोरी कंधे पर थी, झुकी हुई रीढ़ पर टिकती हुई।
मैं कुछ कह पाती, उससे पहले ही वे बोले...
“ज़िंदगी का बोझ उठाना ही है बेटा…
सर पर उठाऊँ या कंधे पर, फर्क कहाँ पड़ता है।”
उनकी मुस्कान में शिकायत नहीं थी,
बस एक लंबा अभ्यास था...
हालात से हार न मानने का।
वे पालक तौलकर देने लगे।
मेरे हाथ में सब्ज़ी थी,
और दिल में एक भारी सा एहसास..
कि कुछ लोग डॉक्टर की सलाह नहीं,
हालात की मजबूरी सुनते हैं।
वे मुस्कुराते हुए चल दिए।
गली फिर वही थी,
पर मुझे लगा...
आज बोझ सिर्फ उनके कंधे पर नहीं था,
थोड़ा-सा मेरे भीतर भी रख गए थे।
~रिंकी सिंह
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