मैं और मेरे अह्सास
अधूरी रही दास्ताँ
अधूरी रही दास्ताँ फ़िर भी चाहत का दम भरते हैं l
आज भी बेवफा से एकतरफ़ा मोहब्बत
करते हैं ll
इश्क़ वाले तो होते है नासमझ पर हुस्न ने की नादानी l
क्यूँ गलती हुई रोज अपनेआप से बारहा
लड़ते हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह