माँ — हिम्मत की पहली पाठशाला
जब दुनिया ने कहा “तू नहीं कर पाएगा”,
तब माँ ने मुस्कुरा कर कहा — “मैं हूँ ना”।
जब रास्ते काँटों से भरे थे,
माँ ने अपने आँचल से उन्हें ढक दिया।
माँ कोई किताब नहीं,
फिर भी हर सबक सिखा जाती है।
माँ कोई पदवी नहीं,
फिर भी जीवन जीना समझा जाती है।
खुद भूखी रहकर,
मेरे सपनों की थाली सजाती रही।
अपने दर्द छुपाकर,
मेरे चेहरे की हँसी बचाती रही।
जब हारने लगा था खुद से,
माँ ने मेरी आँखों में विश्वास भरा।
कहा — “गिरना हार नहीं होता,
उठना ही असली जीत का रास्ता होता।”
माँ ने सिखाया —
हालात कितने भी कठिन हों,
झुकना नहीं है।
आँसू आएँ तो आने दो,
पर उम्मीद को कभी रोना नहीं है।
उसके हाथों की रेखाओं में
मेरे भविष्य की कहानी थी।
उसकी हर दुआ में
मेरी कामयाबी की निशानी थी।
माँ कमजोर नहीं होती,
वो चुप रहना जानती है।
माँ हारती नहीं है,
वो सहना जानती है।
आज जब मैं थोड़ा मजबूत हूँ,
तो ये मेरी नहीं —
माँ की जीत है।
क्योंकि जिसने मुझे खुद पर भरोसा करना सिखाया,
वो सिर्फ मेरी माँ है।
अगर कभी थक जाओ जीवन से,
तो माँ की आँखों में देख लेना,
तुम्हें फिर से उठ खड़े होने की ताकत मिल जाएगी।
माँ — सिर्फ जन्म देने वाली नहीं,
बल्कि ज़िंदगी बनाने वाली होती है।