मयखाने
जब से हुई है मेरी आमद शहर में तेरे,
मुझसे रूठे-रूठे सारे मयखाने हैं।
जब से हुई है आमद मेरी शहर में तेरे,
हर जाम में अब तेरी यादों के पैमाने हैं।
पहले जो दर्द को पीकर हँस लिया करता था,
आज आँसू भी मुझसे कतराने हैं।
तेरी जुदाई ने ऐसा सन्नाटा छोड़ा,
कि साक़ी भी अब मुझसे घबराने हैं।
भीड़ में रहकर भी तन्हा सा रहता हूँ,
मेरे अपने ही अब मुझे पहचानने हैं।
तेरे बाद न इश्क़ बचा, न शराब बची,
बस ख़ामोशी के साए सिरहाने हैं।
जिस शहर में ढूँढता था सुकून कभी,
वहीं हर गली ने ज़ख़्म पुराने जगाने हैं।
तू पास नहीं तो क्या मयख़ाना क्या,
अब तो साँसें भी मुझसे रूठ जाने हैं।