(नया साल और मैं)
काश कैलेंडर की पहली सुबह
मन पर बर्फ-सी जमी उदासी पिघला देती…
जैसे सूरज मिटा दे धुंध की परतें
और मन की छत पर फिर से रोशनी का बसेरा हो जाए |
काश तमाम दुख...
पुरानी डायरी के जैसे, आखिरी महिने
के साथ बंद हो जाते.. |
नए साल की कोरी सफ़ेदी पर,
केवल उम्मीदें लिखी रहतीं...
नीली स्याही की तरह साफ़, चमकीली, उजली |
टूटी हुई इच्छाएँ...
सूखे पत्तों की तरह इकट्ठा हो जाएँ
और एक झोंका
उन्हें पीछे कहीं दूर ले जाए…
फिर पलकों पर...
नववर्ष की पहली ओस-सी चमक उतर आए |
हर रोज़ खुद को शुभकामनाएँ देती हूँ,
जैसे बीज डालूँ सूखी मिट्टी में..
अबकी बार सोचती हूँ
शायद एक अंकुर फूट पड़े,
शायद इस बार दुआ रंग ले आए
आज भी वही उम्मीद उठा कर
नए दिन की दहलीज़ पर रखी..
शायद इस शुभकामना का
आज असर हो जाए…
शायद इस बार साल मुझे
थोड़ा-सा मुस्कुरा कर अपनाए |
~रिंकी सिंह ✍️
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