क्या इतनी बुरी हूँ मैं, माँ?
क्या इतनी बुरी हूँ मैं माँ,
जो हर बार आपकी निगाहों में कमी ही दिखती हूँ?
क्या इतना गलत हूँ मैं माँ,
जो आपकी उम्मीदों की सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते
सांसें ही थक जाती हैं?
मैंने तो बस इतना चाहा था
कि एक बार आप मुझे देखकर मुस्कुरा दें,
कि एक बार मेरे सिर पर हाथ रखकर
कह दें — “बेटी, तू ठीक कर रही है।”
पर हर बार आपकी आँखों में
मेरी गलतियाँ ही उभर आती हैं,
मेरी कोशिशें शायद छोटी पड़ जाती हैं।
क्या इतनी बुरी हूँ मैं माँ,
कि आपकी जितनी चाहत थी,
उतनी मैं खुद को साबित नहीं कर पाई?
पर माँ… मेरी रातें भी रोकर ही कटती हैं,
आपकी उम्मीदों के वजन से
मेरे सपनों की हड्डियाँ भी चटकती हैं।
मैं कमजोर नहीं हूँ माँ,
बस थक गई हूँ हर पल ये साबित करते-करते
कि मैं भी किसी की बेटी हूँ,
मैं भी मायने रखती हूँ,
मैं भी प्यार की हकदार हूँ।
आप जानती हैं माँ,
जब आप गुस्से में कह देती हैं
कि “तुझसे कुछ नहीं होगा,”
तो मेरे भीतर का पूरा आसमान
तपकर राख हो जाता है।
फिर भी मैं चुप रहती हूँ,
क्योंकि आपसे बहस जीतना
मेरी हार होती है।
पर माँ, एक बात आज खुलकर कह दूँ —
मैं बुरी नहीं हूँ।
मैं बस इंसान हूँ,
जिसे गलतियाँ करने का हक है,
जिसे समझने की जरूरत है,
जिसे प्यार की भूख है।
मैं हर बार गिरकर उठती हूँ,
क्योंकि आपने ही सिखाया था
कि बेटी कभी टूटकर बैठती नहीं,
लड़ती है…
आखिरी सांस तक लड़ती है।
आज भी लड़ रही हूँ माँ,
दुनिया से भी, खुद से भी,
और कभी-कभी… आपसे भी।
पर इस लड़ाई में
मैं आपको खोना नहीं चाहती।
माँ…
काश एक बार आप महसूस करें
कि मैं बुरी नहीं, बस अधूरी हूँ,
और आपका एक शब्द,
एक गर्माहट भरा हाथ,
मुझे पूरा बना सकता है।
काश आप समझें माँ,
कि आपकी ही बेटी हूँ,
आपकी ही छाया हूँ,
आपकी ही सीख मेरे भीतर सांस लेती है।
और माँ…
मैं टूटकर भी मुस्कुराती हूँ,
गिरकर भी उठ जाती हूँ,
क्योंकि आपके जैसा बनने की जिद
अभी भी सीने में धड़कती है।
इसलिए नहीं, माँ —
मैं बुरी नहीं हूँ।
मैं वही हूँ
जिसे आपने प्यार से गढ़ा था,
जिसने हर दर्द में आपका नाम लेकर
हिम्मत जुटाई थी।
आज आपसे एक ही दुआ मांगती हूँ—
मुझे कम मत आंकिए माँ,
बस एक बार मेरे दिल की थकान समझिए,
और देखिए —
मैं कितनी मजबूत बन सकती हूँ
अगर आप साथ हों।
क्योंकि माँ…
बेटियाँ बुरी नहीं होतीं,
बस प्यार की एक किरण से
पूरी दुनिया बदल देती हैं।