मेरे लफ्ज़ों की वो चुभन मत याद रखना
मेरे लफ़्ज़ों की वो चुभन मत रखना याद,
कभी हाल-ए-दिल भी पढ़ लिया करो, बिना आवाज़।
तेरे चेहरे को जब सबने घूरा था तानों से,
मैंने खुद को ज़हर पिलाया था अपने ही बयान से।
हां, कह दिया ‘काला’, वो एक लफ्ज़, एक आग था,
पर तेरी हिफ़ाज़त का उस पल बस वही इक राग था।
ज़माने की नज़रों में गिरने न दूँ तुझे,
इसलिए खुद गिर गई, बस तुझसे छुपा के रो दी मैं।
तू सोचता है – मैं अपने होती तो यूँ न कहती,
पर मेरे जैसा कोई अपना यूँ भी क्या सहती?
अपनों से ही तो जख़्म मिलते हैं सबसे गहरे,
तेरा खामोश होना मेरी रूह तक जलाए बहते लहू से।
रातों को चुपके से तेरी तस्वीर से बातें करती हूँ,
तेरी हर नाराज़ी को अपनी सज़ा मानकर जीती हूँ।
तेरी हर पोस्ट पढ़ती हूँ, पर कमेंट नहीं करती,
क्योंकि मैं अब भी अपनी सूरत तेरे नाम से डरती।
कितनी बार सोचा, आ जाऊँ तेरे सामने रो लूँ,
तेरे कदमों में बैठ, अपनी गलती को धो लूँ।
पर तेरी आंखों में वो बेरुख़ी मुझे तोड़ देती है,
और मैं लौट जाती हूँ, अधूरी साँसों के साथ।
सुनो… अगर कभी दिल से निकल जाए मेरी वो बात,
तो एक बार फिर से मुझे ‘अपनी’ कह देना सौगात।
मैं फिर से वही चुपचाप लड़की बन जाऊँगी,
जो तेरे साये में भी, खुद को आबाद पाती थी।
चलो मान लो, मैं गुनहगार हूँ उस एक लम्हे की,
पर क्या हम भूल नहीं सकते उस सज़ा के सिलसिले की?
मुझे फिर से वो मुस्कान दे दो जो तेरे नाम की थी,
फिर चाहे तू कह दे, "तू मेरी जान थी… और है भी।"
अगर मेरे इश्क़ में अब भी कोई सच्चाई बाकी हो,
तो मेरी माफ़ी में भी एक मोहब्बत की गहराई हो।
तेरा हाथ थाम लूं, बस इतना ही ख्वाब है,
तेरी ‘अपनी’ बनूं फिर से — यही मेरा जवाब है।