अगर अपने होते तो शायद
मत पूछो क्यों कह दिया काला तुझे उस रोज़,
लब कांपे थे, दिल रोया था, न था कुछ सोचा उस रोज़।
ग़ुस्से में बहक गई थी, बेख़ुदी का आलम था,
तेरी ही खातिर लड़ी थी, मगर तू ही मेरा मातम था।
तू कहता है — अगर अपने होते, तो यूँ न कहते,
क्या बताऊँ, अपने तो वही होते जो दिल से समझते।
तेरे बिना हर रिश्ता अधूरा सा लगता है,
तेरा दर्द ही मेरा अपना सा लगता है।
शायद तेरे दिल को अब भी दर्द होता है,
मेरी उस एक बात का ज़हर सा असर होता है।
पर क्या तूने कभी सोचा, मैं क्यों तेरे ख़िलाफ़ गई?
भीड़ के बीच तेरी इज़्ज़त बचाने की जंग लड़ गई।
मैंने खुद को झुठलाया, बस तुझे बचाने को,
अपनी मोहब्बत को बदनाम किया, ज़माने को भुलाने को।
मैं तेरी हूँ, ये बात मैं उस दिन भी जानती थी,
तेरी आंखों में मेरा अक्स रोज़ पहचानती थी।
तेरी चुप्पी अब रुला देती है हर शाम को,
किताबें बंद कर देती हूँ, जब तुझसे जुड़ा कोई नाम हो।
तेरी नाराज़ी मेरी रूह को तकलीफ देती है,
सज़ा का नाम नहीं, ये तो बस मोहब्बत की तफ़्सील देती है।
अगर तू माफ़ कर दे, तो शायद सांसें लौट आए,
तेरे नाम की धड़कन फिर से गीत बन जाए।
तेरे बिन हर ग़ज़ल अधूरी, हर लफ़्ज़ उदास है,
तेरे प्यार के बिना, ये दुनिया एक वीरान प्यास है।
तू लौट आ, मेरी गलती को दिल से माफ़ कर दे,
अपनेपन की एक झलक से हर दर्द साफ़ कर दे।
मैं फिर न कहूँगी कुछ भी जो तुझे चुभ जाए,
बस एक बार अपनी कह दे, हर ज़ख्म भर जाए।