११…“कैटॉब्लेपस — मृत्यु की दृष्टि”
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दलदल की नमी में जन्मा था वो,
जहाँ धरती साँस लेती है धीमे—
और हवा में सड़ांध के भीतर
जीवन अपनी अंतिम प्रार्थना करता है।
उसका सिर, जैसे किसी पाप का बोझ,
सदा झुका हुआ —
मानो उसने देख ली हो दुनिया की सारी मौतें,
और अब किसी आँख से न मिलना चाहता हो।
कहते हैं, जो उसकी आँखों में झाँक ले,
वह लौटता नहीं —
क्योंकि उन आँखों में केवल प्रतिबिंब है
उस भय का, जो मनुष्य अपने भीतर पालता है।
हर कदम पर दलदल काँपता है,
हर साँस में ज़हर टपकता है,
और उसकी दृष्टि —
जैसे समय का ठहरा हुआ क्षण,
जो जीवन को बुझा देता है बिना छुए।
वह चलता नहीं, रेंगता है
अपने ही अपराधबोध के नीचे,
जैसे हर कदम किसी शापित आत्मा का वजन ढो रहा हो।
रात जब सबसे गहरी होती है,
वह दलदल के किनारे से देखता है —
नदियों में बहते हुए चाँद को,
और सोचता है:
“कितना आसान है रोशनी होना,
पर कितना कठिन है आँखें उठाना।”
उसकी नज़र मृत्यु नहीं,
बल्कि एक दर्पण है —
जिसमें इंसान अपने पापों का चेहरा देख
स्वयं ही मर जाता है।
कैटॉब्लेपस...
जो कभी ऊपर नहीं देखता,
क्योंकि ऊपर देखने का अर्थ है
सत्य से सामना करना।