बंदिनी ...
ना मैं मीरा .. ना ही राधा .
बस हूँ जोगन तेरे नाम कि
तुझे जित देखूं .. उत चाहूँ ..
ना कुछ सोचूं ..ना कुछ मांगू ..
उर में संमायुं ..या मन में बसाऊं
तुम ही तो आदि मेरे .. अन्नंत पिया
और .. मैं बंदिनी ..
पिया के नाम की
तुम्हरे ही आकर्षण में
मैं बंधी पिया ..
तुम्हरे ही रंग में ..मैं रंगी पिया ..
तुम्हरे ही अगन में .. मैं जली पिया ..
तुम्हरी ही प्यासी ..मैं तुम्हरी ही दासी
तुमहि हो पिया .. मेरे रोम रोम में
मेरे अंतस में तुम्हरी ही वाणी
मेरे अधरों पर तुम्हरी ही लाली
चित में मेरे हो .. स्वाशों में तुम्हहि पिया
मैं ना रह गयी अब मैं पिया ..
मेरा सब अर्पण अब तुझको पिया ..
हूँ मैं अब किस काम की ...
मैं बंदिनी ..
पिया के नाम की