"वहशत और इंतज़ार"
कसम से शाम तो हुई मग़र रात ना हुई,
ज़ब कुछ दिन मेरी तुमसे बात ना हुई।
मौसम तो बदला मेरे शहर का भी मग़र,
मुद्दतों से यहाँ एक बूँद बरसात ना हुई।
ना सुकूँ, ना करार, बेबसी और वहशत,
जबसे मेरी तुमसे कोई मुलाक़ात ना हुई।
बहुत ऐतबार था मुझे अपनी नज़रों पर,
मग़र नज़रों से भी कोई करामात ना हुई।
दिल में उतर जाते थे कभी नज़रों से रस्ते,
मग़र एक अरसे से इश्क में ये वारदात ना हुई।
उम्मीद की कलियाँ मुरझाई सी लगती है,
जबसे तुमसे कसमों वादों की सौगात ना हुई।
Kirti Kashyap"एक शायरा"✍️