Hindi Quote in Poem by dhatri

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एक अरसे बाद
एक अरसे बाद आज अचानक,
आईने के सामने ठहर गई
वही शकल, वही कद- काठी
चेहरे पर बिखरे बाल, गालों पर मुंहासे
आंखो के चारों तरफ पड़ा कालापन
सब कुछ पहले जैसा ही तो था,
फिर भी इस इंसान से कुछ अनजान थी मैं,
अब ये वो नही रही जो किसी के तेज आवाज़ में बात करने से मात्र से ही रोने लगे,
अब चेहरे पर हमेशा एक मुस्कान रहती हैं,
पर इस चेहरे में वो खुशी नहीं दिखती
समझदार बनते -बनते ना जाने कब बेवकूफों के उन काफिलों का हिस्सा बन गई जो सब ठीक है,
जिंदगी बहुत बढ़िया चल रही है और ना जानें कितने बहाने से अपने जज्बातों पर एक अभिमान जिसे हम स्वाभिमान भी कहते हैं 🤣😂 उसकी एक चादर लपेट ली है,
अब गुजरते वक्त के साथ ये लगता है कि सामने वाला शायद
हमें ना समझ पाए, या हमारी हालत का मज़ाक बनाएं
जब बचपना था तो हर कोई अपना था
हर किसी से एक अटूट रिश्ता था,
थोड़े समझदार क्या हुए हर रिश्ता एक बोझ सा लगता
हिम्मत चाहिए अपने जज्बातों को दिखाने की
किसी के सामने रोने की, हंसने की, चिल्लाने की
समाज - घर, लोग की चिंता छोड़ खुद से प्यार जताने की
किसी A 4 size के पन्ने के दोनों तरफ अपने नाम को लिखकर दोहराने की
आरज़ू यही रह गई खुद को वापस पाने की,
देख के खुद को आईने में खुद में ही खो जानें की।

Hindi Poem by dhatri : 112002768
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