युग कलयुग है आया बड़ा विचित्र
कोई ना होता है यहाँ तृप्त
जितना दो उतना कम लगता है
बात इस युग ने हमें बतलाई एक गुप्त
कुछ नहीं मिलने वाला में मुफ्त
मेहनत करे तो काम बनेगा
नहीं तो राम राम कहेगा
भरोसे किसी के नही चलने वाली
गाड़ी यह जिंदगी की
महा भारत रामायण ने कुछ बताया है
तभी तो ये बुद्धि पाया है
सफलता नहीं मिल जाती इतनी आसानी से
तभी तो मिली आजादी बलिदानी से
युग कलयुग है आया बड़ा विचित्र
छिड़क कर चलते हैं सब इत्र
लोग यहाँ पर ऊपर से खरा सोना नीचे से खोट आ
सिक्का होते हैं फसल बोने की जगह एक दूसरे की बाते बोते हैं
संभल कर चलना
कहीं फसे ना गाड़ी जिंदगी की कीचड़ में
बांध कर रखना बुरआईयों को सीकर में
छोड़ देना अच्छे को खुशबू फैलाने के लिए
बुल बुल को तराना गाने के लिए
संभल कर चलना
युग कलयुग है आया बड़ा विचित्र