“जुगाड़ के आईएएस !”
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भोपाल के नसीम ढाबे वाले का बेटा पाँच साल से यूपीएससी की तैयारी कर रहा था।
चार बार परीक्षा दी,पर हर बार प्रीलिम्स में ही ध्वस्त हो गया।
ढाबे का एक नियमित ग्राहक था रघुवंशी, खुद को रिटायर्ड खुफ़िया विभाग का अफ़सर बताता था।
नसीम ने दुख जताया-
“साहब, लड़का हाड़ तोड़ पढ़ाई करता है, पर नसीब साथ नहीं देता है।”
रघुवंशी हंसकर बोला-
“पढ़ाई से कोई आईएएस नहीं बनता भाई, जुगाड़ चाहिए जुगाड़। मेरे दोस्त हैं सुशील मेहरा, बड़े आईएएस अफ़सर,काम पक्का करवा देंगे।”
कई मुलाक़ातों और मनुहारों के बाद डील फाइनल हुई।
कुल खर्चा—पचपन लाख।
सुनिश्चित हुआ -“इस बार रिज़ल्ट में नाम पक्का होगा।”
दो महीने बाद रिज़ल्ट आया।
लड़के का नाम फिर भी नदारद।
नसीम ने फोन मिलाया—स्विच ऑफ़।
घर पहुँचा—ताले लटके मिले।
खुफ़िया दफ़्तर में पूछा तो जवाब मिला—
“हमारे यहाँ इस नाम का कोई अफ़सर ना था,ना है।”
यूपीएससी कार्यालय में पता लगाया तो कहा गया—“ हमारे यहां सुशील मेहरा नाम के अफसर का कोई रिकॉर्ड तक मौजूद नहीं है।”
ढाबे की मेज़ पर पराँठे ठंडे पड़े थे…
और नसीम का बेटा फिर से मोटी-मोटी किताबों में सिर गाड़े बैठा था।
आर के भोपाल।(लघुकथा)