बिहार का ग्रामीण समाज (1990–2025)समृद्धि के नकली सिक्के और बौद्धिक निर्वासन!
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गांधीजी ने कभी कहा था कि “भारत की आत्मा गाँवों में बसती है।”
अगर आज गांधीजी बिहार के गाँवों में लौटकर आते तो शायद जोड़ देते—“हाँ, आत्मा तो है, पर ICU में।”
लालू युग (1990–2005)
सामाजिक न्याय के नाम पर गाँवों को अपराध का प्रयोगशाला बना दिया गया।
विश्वविद्यालय, जिला मुख्यालय से लेकर गांव के चौपाल तक सब राजनीति और अपराध के अखाड़े बने।
जातीय नारे और डंडे की सत्ता में, शिक्षा ऐसे गायब हुई जैसे गायब दूध का हिसाब बिल्ली के पास नहीं मिलता।
गाँवों में सामाजिक न्याय की राजनीति ने भले सामाजिक न्याय दिया, पर पढ़ाई-लिखाई को फाँसी पर चढ़ा दिया।
नीतीश युग (2005–2025)
सड़क, बिजली, पुल, अस्पताल सब आ गए।
गाँव की गलियाँ चमक उठीं, बिजली के तार ऐसे बिछे जैसे विकास का जाल हर घर में फैला हो।
पर शिक्षा?
वो अब भी लंगड़ी मार जूते पहनकर चलती रही।
विद्यालयों में शिक्षक तो हैं, मगर उनका समय व्हाट्सऐप फॉरवर्ड पर ज्यादा और ब्लैकबोर्ड पर कम बीतता है।
गाँव में “योजनाओं का मेला” लग गया—मुफ्त राशन, गैस, स्वास्थ्य कार्ड, आवास योजना।
लेकिन आत्मनिर्भरता?,उसे सरकारी फाइलों में स्वर्गीय घोषित कर दिया गया।
अब गाँव में मेहनत करना बेवकूफी है और सरकारी योजना को हडप जाना स्मार्टनेस।
उद्यमिता का नाम सुनते ही लोग हँस पड़ते हैं—“काहे मुँह काला करब? सरकार राशन दे ही देत है।”
आज गाँव का स्टेटस सिंबल है
चमचमाती बाइक,ब्रांडेड शर्ट,
और भोजभात में पाँच तरह का मीट।
यह सब कहाँ से आता है?
वैध कमाई से नहीं, जुगाड़, घूस, शराब तस्करी जैसे छोटे बड़े अपराध से।
गाँव का नेतृत्व अब उस वर्ग के पास है, जो झूठ और दबंगई का सर्टिफिकेट लिए घूमता है।
ईमानदारी अब “बेवकूफी” है और छल को लोग “चालाकी भरा गुण ” कहकर ताली बजाते हैं।
बुद्धिजीवी वर्ग पलायन कर गया कोई दिल्ली, कोई मुंबई,तो कोई कहीं पड़ोसी राज्य में।
पंच ,सरपंच, मुखिया,सचिव वार्ड पार्षद
सब वही हैं जिनके जेब में स्थानीय गुंडई की लायसेंस है, और जो बड़े नेताओं और अधिकारियों से मिलकर तमाम सरकारी योजनाओं को हड़पने या भारी कमीशन खाकर मनमाफिक वितरण करने में होशियार हैं।
पहले त्योहारों में मेलजोल होता था, अब भोजभात में दिखावा।
पहले समाज की ताकत एक दूसरे पर भरोसा था, अब एक दूसरे पर हमेशा संदेह की नजर।
पहले गाँव का सम्मान कृषि और मेहनत में था, अब काहिली और सरकारी योजना हड़पने में।
बिहार का गाँव आज दो चेहरों वाला है—
बाहर से चमकदार, उपभोगतावादी,और सरकारी योजनाओं पर निर्भर।
भीतर से खोखला, बौद्धिक रूप से दरिद्र, नैतिक रूप से दिवालिया।
राज्य ने वोट-बैंक को सींचा, पर आत्मा को सुखा दिया!
आर के भोपाल।