परिवर्तन का ताप और स्थायित्व का तापमान!
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भारतीय इतिहास की धारा सदियों से यही कहती आई है—अचानक उफान भले ही क्रांति का ज्वार ला दे, मगर उसका रक्तरंजित शोर स्थायित्व नहीं ला पाता। स्थिरता केवल उस परिवर्तन की देन है जो धीरे-धीरे, धरती की गहराइयों में बीज की तरह जड़ें जमाता है।
रामायण में भी यही भाव है। राम वनवास जाते हैं। वनवास चौदह वर्षों का है—एक क्षणिक विद्रोह से अयोध्या को बर्बाद करने के बजाय समय की कसौटी पर तप कर लौटना ही स्थिर समाधान था। तुलसीदास ने राम के धैर्य को रेखांकित करते हुए कहा
“धीरज, धर्म, मित्र अरु नारी। आपद काल परखिये चारी॥”
भारत में अशोक का प्रसंग अत्यंत मार्मिक है। कलिंग के युद्ध ने अचानक परिवर्तन का प्रयास किया—लाखों लाशें, रक्त की नदियाँ, शोक से भरा सम्राट। परिणाम? वह हिंसक विजय क्षणिक साबित हुई। स्थायी परिवर्तन तब आया जब अशोक ने धीरे-धीरे बौद्ध धर्म और अहिंसा का संदेश फैलाया।
मुग़ल काल में अकबर की नीति को देखिए। “सुलह-ए-कुल” एक दिन में लागू नहीं हुई। धीरे-धीरे हिंदू, मुसलमान, जैन, ईसाई—सबको साथ लेकर एक ताना-बाना बुना गया। यह धैर्य ही था जिसने स्थायित्व की नींव रखी।
आधुनिक भारत में गांधीजी का उदाहरण सर्वाधिक प्रासंगिक है। “अचानक विद्रोह” का रास्ता उनके लिए आसान था, परंतु उन्होंने सत्याग्रह और असहयोग को चुना—धीरे-धीरे, पीढ़ी दर पीढ़ी जनता के भीतर अनुशासन और आत्मबल पैदा किया। यही कारण है कि स्वतंत्रता केवल तात्कालिक घटना न होकर स्थायी उपलब्धि बनी। गांधीजी के शब्द याद कीजिए—
“सच्चा लोकतंत्र वही है, जो धीरे-धीरे जनता के मन और कर्म में उतरता है।”
काव्य-साक्ष्य
कबीर ने चेताया था“धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय॥”
दिनकर ने भी क्रांति की उत्तेजना और धैर्य की आवश्यकता को जोड़ते हुए कहा—
“बलिदान जिनका उधार है,
हम उनके ऋणी सदा रहेंगे।
पर धैर्य बिना इतिहास अधूरा,
क्रांति के पथ पर ठहरेंगे॥”
ये पंक्तियाँ बताती हैं कि बलिदान और वेग आवश्यक हैं, पर स्थायित्व के लिए धैर्य और क्रमिकता अनिवार्य है।
आज भी जब हम नीतियों और सुधारों पर नज़र डालते हैं तो वही सबक सामने आता है। आर्थिक उदारीकरण 1991 में अचानक घोषणा के रूप में आया, लेकिन उसका स्थायित्व धीरे-धीरे संस्थाओं, बाज़ार की संरचनाओं और जनता की मानसिकता में बदलाव से ही सुनिश्चित हुआ। डिजिटल इंडिया या हरित ऊर्जा की योजनाएँ भी एक झटके में सफल नहीं हो सकतीं; इन्हें क्रमशः शिक्षा, तकनीक और सामाजिक व्यवहार में समाहित करना पड़ता है।
भारतीय संस्कृति का गूढ़ संदेश यही है—
“शाश्वतता उफान से नहीं, अविरल धारा से जन्म लेती है।”
पौराणिक काल से लेकर आधुनिक युग तक हर उदाहरण इस बात को पुष्ट करता है कि क्रांति यदि स्थायी चाहिए तो वह रक्त की बूँदों से नहीं, समय की बूँदों से सींचनी होगी। अचानक उठी आँधी छत उखाड़ देती है, पर धीरे-धीरे चलने वाली हवा ही ऋतु बदलती है।
इसलिए भारत का सूत्र-वाक्य यही है—“परिवर्तन हो, मगर धैर्य के साथ। क्रांति हो, मगर स्थायित्व के साथ।”
आर के झा भोपाल ।