"तड़प-ए-दीद"
हर शाम-ओ-सहर ज़हन में बस तेरी याद होती है,
तेरे आने से पहले भी, तेरे जाने के बाद होती है।
एक दिन भी इक अरसा लगता है तुझे देखे बिना,
तरसती निगाहों को तेरे दीदार की फ़रियाद होती है।
मेरी रूह-ओ-क़ल्ब क़ैद हो चुके हैं अब तुझमें ही,
बस वस्ल की ही ख़ुदा से अब मुराद होती है।
चश्म-ए-क़ल्ब से वस्फ़ में जब अश'आर लिखती हूँ,
तेरे हर हर्फ़ पे अहल-ए-नज़र की रूह शाद होती है।
"तन्हाई के रंज-ओ-आलम में जीते हैं दिलज़दगाँ,"
मोहब्बत मुकम्मल ना हो तो हयाते बर्बाद होती है।"
तड़प-ए-दीद, ख़लिश, बेचैनी, दर्द, शब भर करवटें,
फक़त ‘कीर्ति’ फिर कहाँ रुह हिज्र से आबाद होती है।
Kirti Kashyap "एक शायरा"✍️
कल्ब = दिल
चश्म = आँखे
वस्ल = मिलन
वस्फ = प्रशंसा
अश'आर = दो या दो से अधिक छंद या शे'र, दोहे
हर्फ़ = अक्षर
अहल-ए-नज़र = प्रेम की दृष्टि से देखने वाला
रंज-ओ-आलम = ग़म और तकलीफ
दिलज़दगाँ = जख़्मी दिल वाले
हयात = ज़िन्दगी
शाद = खुश, प्रसन्न
शब = रात
हिज़्र = जुदाई