लोकतंत्र की शवयात्रा निकल चुकी है, बस हारमोनियम और ढोलक की जगह टीवी चैनलों की डिबेट और भक्तों की तालियां बज रही हैं।
जनता अब मतदाता नहीं,अभक्त,भक्त और फकीर बने बैठे हैं।
नेता के लिए मंदिर बन रहे हैं, उनकी तस्वीर पर दूध चढ़ाया जा रहा है।
और जो कहे—“भाई, ये इंसान है, भगवान नहीं”—
वो तुरत “राष्ट्रविरोधी” घोषित कर दिया जाता है।
आज हाल ये है कि संविधान को लोग पढ़ते नहीं,
नेता जी का चेहरा देखकर ही संविधान की व्याख्या हो जाती है।
विचारधारा मर चुकी है, बस आरती की थाली बची है।
सच यही है—
जहाँ लोकतंत्र में जनता भगवान होती है, वहाँ अब भगवान नेता बन गया है,
और लोकतंत्र—बस उसकी भक्ति-सभा।
आर के भोपाल।